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________________ चतुश्चत्वारिंशत्तम पर्व इति सौलोचने युद्धे समिद्धे शमिते तदा । पपात पञ्चभूजेभ्यो वृष्टिः सुमनसां दिवः ॥३४६॥ जयश्रीदुर्जयस्वामितनूजविजयार्जिता । नोत्सेकायेति" नास्यैनं पैव प्रत्युताश्रयत् ॥३७॥ 'जयेनास्थान सङ्ग्रामजयायातेति लज्जया। दूरीकृतेव तत्कीतिर्दिगन्तमगमत्तदा ॥३४८॥ भकम्पनमहीशस्य यूथेशं वा वनद्विपैः । भूपैः संयमितैः" साधमर्ककीर्ति समर्प्य सः ॥३४९॥ विजया महागन्धसिन्धुरस्कन्धसंवृतः । निर्भस्सिंतोदय क्ष्माभृन्मूर्धस्थवन मण्डलः ॥३५०॥ रणभूमि समालोक्य समन्ताद्बहुविस्मयः । मृतानां प्रेतसंस्कारं जीवतां जीविकाक्रियाम् ॥३५॥ कारयित्वा पुरीं सर्वसम्मदाविष्कृतोदयाम् । प्राविशत् प्रकटेश्वर्यः सह मेघप्रमादिभिः ॥३५२॥ अकम्पनोऽप्यनुप्राप्य' वृतैरन्तःसमाकुलः । राजकण्ठीरवैर्वामा राजपुत्रशतैः पुरम् ॥३५३॥ सरक्षान् धृतभूगलान् कुमारं च नियोगिमिः । आश्वास्याश्वासकुशलैर्यथा स्थानमवापयत् ॥३५४॥ विचिन्त्य विश्वविघ्नानां विनाशोऽहत्प्रसादतः । इति वन्दितुमाजग्मुः सर्वे नित्यमनोहरम् ॥३५५॥ दूरादेवावरुह्यात्मवाहेभ्यः शान्तचेतसः। परीत्यार्थामिरागत्यतुष्टवुः स्तुतिभिर्जिनान् ॥३५६॥ समान नागपाशसे इस प्रकार बाँधा जिससे वे हिल-डुल न सकें ॥३४४-३४५।। इस प्रकार जब सुलोचना-सम्बन्धी प्रचण्ड युद्ध शान्त हो गया तब स्वर्गके पाँच प्रकारके कल्पवृक्षों से फूलोंकी वर्षा हुई ॥३४६॥ अपने दुर्जेय स्वामी ( भरत ) के पुत्र अर्ककीतिके जीतनेसे उत्पन्न हुई विजयलक्ष्मी जयकुमारके अहंकारके लिए नहीं हुई थी बल्कि इसके विपरीत लज्जाने ही उसे आ घेरा था ॥३४७॥ 'यह अयोग्य समयमें किये हए संग्रामके जीतनेसे आयी है' इस लज्जाके कारण जयकुमारके द्वारा दूर की हुई के समान उसकी वह कीर्ति उसी समय दिशाओंके अन्त तक चली गयी थी ॥३४८॥ जिस प्रकार समर्थ पुरुष जंगली हाथियोंके समान झुण्डके मालिक बड़े हाथीको पकड़कर राजाके लिए सौंपते हैं उसी प्रकार जयकुमारने बँधे हुए अनेक राजाओंके साथ अर्ककीर्तिको महाराज अकम्पनके लिए सौंप दिया, तदनन्तर उदयाचलके शिखरपर स्थित सूर्यमण्डलको तिरस्कृत करता हुआ विजयार्ध नामके बड़े भारी मदोन्मत्त हाथीके स्कन्धपर सवार होकर युद्धका मैदान देखनेके लिए निकला, चारों ओरसे युद्धका मैदान देखकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ, उसने मरे हुए लोगोंका वाहसंस्कार कराया और जीवित पुरुषोंके अच्छे होनेका उपाय कराया, इस प्रकार जिसका ऐश्वर्य प्रकट हो रहा है ऐसे जयकुमारने मेषप्रभ आदिके साथ-साथ सबको आनन्द मिलनेसे जिसकी शोभा खूब प्रकट की गयी है ऐसी काशीनगरीमें प्रवेश किया ॥३४९-३५२॥ महाराज अकम्पनने भी सैकड़ों राजपुत्रों तथा सिंहके समान तेजस्वी राजाओंके साथ-साथ नगरमें, पहुँचकर रक्षा करनेवाले जिनके साथ हैं ऐसे बँधे हुए अनेक राजाओं तथा अर्ककीतिको समझाने में कुशल नियुक्त किये हुए पुरुषों द्वारा समझा-बुझाकर उन्हें उनके योग्य स्थानपर पहुँचाया ॥३५३-३५४॥ अरहन्तदेवके प्रसादसे ही सब विघ्नोंका नाश होता है ऐसा विचारकर सब लोग वन्दना करनेके लिए नित्यमनोहर नामके चैत्यालयमें आये ॥३५५॥ उन सभीने दूरसे ही अपनी-अपनी सवारियोंसे उतरकर शान्तचित्त हो मन्दिरमें प्रवेश किया और प्रदक्षिणाएं देकर अर्थसे भरी हई स्तुतियोंसे जिनेन्द्रदेवकी स्तुति की ॥३५६।। १ सुलोचनासम्बन्धिनि । २ उपशान्ते । ३ 'मन्दारः पारिजातकः । सन्तानः कल्पवृक्षश्च पुंसि वा हरिचन्दनम्' इति पञ्चसुरभूजेभ्यः। ४ स्वर्गात् । ५ गर्वाय । ६ तस्यैनम् ल.। एनम् जयकुमारम् । ७ पुनः किमिति चेत् । ८ जयकुमारेण । ९ अनुचितस्थानकृतयुद्धविजयात् समुपागता। १० गजयूथाधिपम् । ११ बद्धः । १२ उदयाचल । १३ रवि । १४ शव । १५ जोवन्तीति जीवन्तस्तेषाम् । १६ जीवनोपायमित्यर्थः । १७ अभिलक्षितैः । १८ इव । १९ सह । २० सहस्रः। २१ नित्यमनोहराख्यं चैत्यालयम् । २२ निजवाहनेभ्यः । २३ स्तुति चक्रुः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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