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________________ ४२२ आदिपुराणम् जयोऽपि जगदीशानमित्याप्तविजयोदयः। अस्तावीदस्तकर्माणं भकिनिर्भरचेतसा ॥३५७॥ वियोगिनी शमिताखिलविघ्नसंस्तवस्त्वयि तुच्छोऽप्युपयात्यतुच्छताम् । शुचिशुनिपुटेऽम्बु संघृतं ननु मुक्ताफलतां प्रपद्यते ॥३५८।। घट्यन्ति न विघ्नकोटयो निकटे त्वक्रमयोनिवासिनाम् । पटवोऽपि फलं दवाग्निमि भयमस्त्यम्बुधिमध्यवर्तिनाम् ॥३५९॥ हृदये त्वयि सन्निधापिते रिपवः केऽपि मयं विधित्सवः । अमृताशिषु सत्सु सन्ततं विषमोदार्पितविप्लवः कुतः ॥३६॥ उपयान्ति समस्तसंपदो विपदो विच्युतिमाप्नुवन्त्यलम् । वृषभं 'वृषमार्गदेशिनं झषकेतुद्विषमाप्नुषां सताम् ॥३६१॥ वसन्ततिलकम् इत्यं भवन्तमतिमक्तिपथं निनीषोः" प्रागेव बन्धकलयः' प्रलयं व्रजन्ति । पश्चादनश्वरमयाचितमप्यवश्यं १२सम्पत्स्यतेऽस्य विलसद्गुणमभद्रम् ॥३६२॥ जिसे विजयका ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है ऐसा जयकुमार भी भक्तिसे भरे हुए हृदयसे समस्त कर्मों को नष्ट करनेवाले जगत्पति-जिनेन्द्रदेवकी इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥३५७॥ हे समस्त विघ्नोंको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्रदेव, आपके विषयमें किया हुआ स्तवन थोड़ा होकर भी बड़े महत्त्वको प्राप्त हो जाता है सो ठीक ही है क्योंकि पवित्र सीपके सम्पुटमें पड़ी हुई पानीकी एक बूंद भी मोतीपनेको प्राप्त हो जाती है-मोतीका रूप धारण कर लेती है ॥३५८॥ हे देव, फल देनेमें चतुर करोड़ों विघ्न भी आपके चरणोंके समीप निवास करनेवाले पुरुषोंको कुछ फल नहीं दे सकते सो ठीक ही है क्योंकि क्या समुद्रकें बीचमें रहनेवाले लोगोंको दावानलसे कभी भय होता है ? ॥३५९॥ हे प्रभो, आपको हृदयमें धारण करनेपर फिर ऐसे कौन शत्रु रह जाते हैं जो भय देनेको इच्छा कर सकें, निरन्तर अमृतभक्षण करनेवाले पुरुषोंमें किसी विषसे उत्पन्न हुआ उपद्रव कैसे हो सकता है ? ॥३६०॥ धर्मके मार्गका उपदेश देनेवाले और कामदेवके शत्रु श्रीवृषभदेवकी शरण लेनेवाले सज्जन पुरुषोंको सब सम्पदाएँ अपनेआप मिल जाती हैं और उनकी सब आपत्तियां अच्छी तरह नष्ट हो जाती हैं ॥३६१॥ हे शोभायमान गुणोंसे कल्याण करनेवाले जिनेन्द्र, इस प्रकार जो आपको अतिशय भक्तिके मार्गमें ले जाना चाहता है उसके कर्मबन्धके सब दोष पहले ही से प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं और फिर पीछेसे कभी नष्ट नहीं होनेवाला मोक्षरूपी कल्याण बिना माँगे ही अवश्य प्राप्त हो १ प्राप्त । २ स्तौति स्म । ३ अस्ति किम् । ४ सन्निधानीकृते । ५ परिभवम् । ६ विधातुमिच्छवः । ७ अमृतमश्नन्तीति अमृताशिनस्तेषु । ८ धर्ममार्गोपदेशकम् । ९ प्राप्नुवताम् । १० नेतुमिच्छोः । ११ बन्धदोषाः । १२ सम्पन्नं भविष्यति । १३ कल्याणम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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