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________________ एकचत्वारिंशत्तमं पर्व अथ चक्रधरः काले व्यतिक्रान्ते कियत्यपि। स्वप्नान्न्यशामयत्' कांश्चिदेकदाऽद्भुतदर्शनान् ॥१॥ तत्स्वमदर्शनात् किंचिदुत्वस्त इव चेतसा । प्रबुद्धः सहसा तेषां फलानीति व्यतर्कयन् ॥२॥ असत्फला इमे स्वप्नाः प्रायेण प्रतिभान्ति माम् । मन्ये दूरफलांश्चैतान् पुराकल्पे फलप्रदान् ॥३॥ कुतश्चिद् भगवत्यद्य प्रतपत्यादिभर्तरि । प्रजानां कथमेवैवंविधोपप्लवसंभवः ॥४॥ ततः कृतयुगस्यास्य व्यतिक्रान्तौ कदाचन । फलमेते प्रदास्यन्ति नूनमेनःप्रकर्षतः ॥५॥ युगान्तविप्लवोदर्कास्त एतेऽनिष्टशंसिनः । स्वनाः प्रजाप्रजापालसाधारणफलोदयाः ॥६॥ यद्वच्चन्द्रार्कविम्बोत्थविक्रियाजनितं फलम् । जगत्साधारणं तद्वत् सदसच्चास्मदीक्षितम् ॥७॥ इतीदमनुमानं नः स्थूलार्थानुप्रचिन्तनम् । सूक्ष्मतत्त्वप्रतीतिस्तु प्रत्यक्षज्ञानगोचरा ॥८॥ केवलार्काढते नान्यः संशयध्वान्तभेदकृत् । को हि नाम तमो''नैशं हन्यादन्यत्र भास्करात् ॥६॥ तत्त्वादर्श स्थिते देवे को नामास्मन्मतिभ्रमः। सत्याद” करामर्शात् कः पश्यन्मुखसौष्ठवम् ॥१०॥ "तदत्र भगवद्वक्त्रमङ्गलादर्शदर्शनात् । युक्ता नस्तत्त्वनिर्णीतिः स्वप्नानां शान्तिकर्म च ॥११॥ अपि चास्मदुपझं यद् द्विजलोकस्य सर्जनम् । गत्वा तदपि विज्ञाप्यं भगवत्पादसंनिधौ ॥१२॥ अथानन्तर-कितना ही काल बीत जानेपर एक दिन चक्रवर्ती भरतने अद्भ त फल दिखानेवाले कुछ स्वप्न देखे ॥ १ ॥ उन स्वप्नोंके देखनेसे जिन्हें चित्तमें कुछ खेद-सा उत्पन्न हुआ है ऐसे वे भरत अचानक जाग पड़े और उन स्वप्नोंके फलका इस प्रकार विचार करने लगे ॥ २ ॥ कि ये स्वप्न मुझे प्रायः बुरे फल देनेवाले जान पड़ते हैं तथा साथमें यह भी जान पड़ता है कि ये स्वप्न कुछ दूर आगेके पंचम कालमें फल देनेवाले होंगे ॥३॥ क्योंकि इस समय भगवान् वृषभदेवके प्रकाशमान रहते हुए प्रजाको इस प्रकारका उपद्रव होना कैसे सम्भव हो सकता है ? ॥४॥ इसलिए कदाचित् इस कृतयुग ( चतुर्थकाल ) के व्यतीत हो जानेपर जब पापकी अधिकता होने लगेगी तब ये स्वप्न अपना फल देंगे ॥५॥ युगके अन्तमें विप्लव फैलाना ही जिनका फल है ऐसे ये स्वप्न अनिष्टको सूचित करनेवाले हैं और राजा तथा प्रजा दोनोंको मान फल देनेवाले हैं ॥६॥ जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यके बिम्बसे उत्पन्न होनेवाली विक्रियासे प्रकट हुआ फल जगत्के जीवोंको समानरूपसे उठाने पड़ते हैं उसी प्रकार मेरे द्वारा देखे स्वप्नोंके फल भी समस्त जीवोंको सामान्यरूपसे उठाने पड़ेंगे ॥७॥ इस प्रकार हमारा यह अनुमान केवल स्थूल पदार्थका चिन्तवन करनेवाला है, सूक्ष्म तत्त्वकी प्रतीति प्रत्यक्ष ज्ञानसे ही हो सकती है ॥८॥ केवलज्ञानरूपी सूर्यको छोड़कर और कोई पदार्थ संशयरूपी अन्धकार को भेदन करनेवाला नहीं है सो ठीक ही है क्योंकि सूर्यको छोड़कर ऐसा कोन है जो रात्रिका अन्धकार नष्ट कर सके ॥९॥ तत्त्वोंका वास्तविक स्वरूप दिखलानेवाले भगवान् वृषभदेवके रहते हुए मुझे बुद्धिका भ्रम क्यों होना चाहिए, भला दर्पणके रहते हुए ऐसा कौन पुरुष है जो हाथके स्पर्शसे मुखकी सुन्दरता देखे ?॥१०-११॥ इसलिए इस विषयमें भगवान्के मुखरूपी मंगल १. ददर्श । २ मम प्रकाशन्ते । ३ पश्चाद्भाविकाले। पञ्चमकाले इत्यर्थः । ४ प्रकाशमाने सति । ५ तस्मात् कारणात । ६ चतुर्थकालस्य । ७ पाप। ८ यगस्य चतर्थकालस्यान्ते विप्लव एव उदर्क उत्तरफलं येषां ते। ९ मयेक्षितम् । १० केवलज्ञानविषया। ११ निशासंबन्धि । १२-दर्पणे विद्यमाने सति । १३ तत् कारणात् । १४ स्वरूपनिर्णयः । १५ मया प्रथमोपक्रान्तम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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