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________________ आदिपुराणम् ततो विधिममुं सम्यगवगम्य कृतागमः । विधानेन प्रयोक्तव्याः क्रियामन्त्रपुरस्कृताः ॥२२०॥ वसन्ततिलकावृत्तम् इत्थं स धर्मविजयी भरताधिराजो धर्मक्रियासु कृतधीनृपलोकसाक्षि ।। तान् सुव्रतान् द्विजवरान विनियम्य सम्यक धर्मप्रियः समसृजत् द्विजलोकसर्गम् ॥२२१॥ मालिनी इति भरतनरंन्द्रात् प्राप्तसत्कारयोगा व्रतपरिचयचारूदारवृत्ताः श्रुताढ्याः । जिनवृषभमतानुव्रज्यया पूज्यमानाः - जगति बहुमतास्ते ब्राह्मणाः ख्यातिमीयुः ॥२२२॥ - शार्दूलविक्रीडितम् । वृत्तस्थान थ तान् विधाय सभवानिक्ष्वाकुचूडामणिः । जैने वर्मनि सुस्थितान् द्विजवरान् संमानयन् प्रत्यहम् । स्वमने कृतिनं मुदा परिगतां स्वां सृष्टिमुच्चैः कृतां पश्यन् कः सुकृती कृतार्थपदवीं नात्मानमारोपयेत् ॥२२३॥ इत्या भगवजिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे द्विजोत्पत्तौ-क्रियामन्त्रानुवर्णनं नाम चत्वारिंशत्तम पर्व ॥४०॥ aurwanix सेनापतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकते उसी प्रकार मन्त्रोंसे रहित क्रियाएँ भी प्रयोग करनेवाले पुरुषोंकी कुछ भी सिद्धि नहीं कर सकतीं ॥२१९।। इसलिए शास्त्रोंका अभ्यास करनेवाले द्विजोंको यह सब विधि अच्छी तरह जानकर मन्त्रोच्चारणके साथ-साथ सब क्रियाएँ विधिपूर्वक करनी चाहए ॥२२०॥ इस प्रकार जिसने धर्मके द्वारा विजय प्राप्त की है, जो धार्मिक क्रियाओंमें निपुण है और जिसे धर्म प्रिय है. ऐसे भरतक्षेत्रके अधिपति महाराज भरतने राजा लोगोंकी साक्षीपूर्वक अच्छे-अच्छे व्रत धारण करनेवाले उन उत्तम द्विजोंको अच्छी शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्णकी सृष्टि की अर्थात् ब्राह्मणवर्णकी स्थापना की ॥२२१॥ इस प्रकार महाराज भरतसे जिन्हें सत्कारका योग प्राप्त हुआ है, व्रतोंके परिचयसे जिनका चारित्र सुन्दर और उदार हो गया है, जो शास्त्रोंके अर्थों को जाननेवाले हैं और श्री वृषभ जिनेन्द्रके मतानुसार धारण की हुई दोक्षासे जो पूजित हो रहे हैं ऐसे वे ब्राह्मण संसारमें बहुत ही प्रसिद्धिको प्राप्त हुए और खूब ही उनका आदर-सन्मान किया गया ॥२२२॥ तदनन्तर इक्ष्वाकुकुलचूड़ामणि महाराज भरत जैनमार्गमें अच्छी तरह स्थित रहनेवाले उन ब्राह्मणोंको सदाचारमें स्थिर कर प्रतिदिन उनका सन्मान करते हुए अपने आपको धन्य मानने लगे सो ठीक ही है क्योंकि आनन्दसे युक्त तथा उत्कृष्टताको प्राप्त हुई अपनी सृष्टिको देखता हुआ ऐसा कौन पुण्यवान् पुरुष है जो अपने आपको कृतकृत्य न माने ॥२२३॥ इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें द्विजोंकी उत्पत्तिमें क्रियामन्त्रोंका वर्णन करनेवाला यह चालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ। १ संपूर्णशास्त्रैः । २ संपूर्णबुद्धिः । ३ वताभ्यास । ४ श्रुतार्थाः द०, ल० । ५ मतानुगमनेन । ६ चारित्रपदं गतान् । ७ पूज्यः । ८ संतोषेण सह । ९ समन्वितामित्यर्थः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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