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________________ चत्वारिंशत्तमं पर्व २९५ स्वादेवब्राह्म गायेति स्वाहेत्यन्तमतः पदम् । सुब्राह्मणाय स्वाहान्तः स्वाहान्ताऽनुपमाय गीः ॥ ३५ ॥ ॥ सम्यग्दृष्टिपदं चैव तथा निधिपतिश्रुतिम् । ब्रूयाद् वैश्रवणोकिं च द्विः स्वाहेति ततः परम् ॥३६॥ काम्यमन्त्रमतो ब्रूयात् पूर्ववन्मन्त्रविद् द्विजः । ऋषिमन्त्रमितो वक्ष्ये यथाऽऽहोपासकश्रुतिः ॥३१॥ चूर्णिः - सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, पट्कर्मगे स्वाहा, ग्रामयतये स्वाहा, अनादिश्रोत्रियाय स्वाहा, स्नातकाय स्वाहा, श्रावकाय स्वाहा, देवब्राह्मणाय स्वाहा, सुब्राह्मणाय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते श्रवण वैश्रवण स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । ऋषिमन्त्रः प्रथमं सत्यजाताय नमः पदमुदीरयेत् । गृह्णीयादर्हज्जाताय नमः शब्दं ततः परम् ॥ ३८ ॥ निर्ग्रन्थाय नमो वीतरागाय नम इत्यपि । महाव्रताय पूर्व च नमः पदमनन्तरम् ॥३९॥ त्रिगुप्ताय नमो महायोगाय नम इत्यतः । ततो विविधयोगाय नम इत्यनुपव्यताम् ॥४०॥ विविधर्द्धिपदं चास्मान्नमः शब्देन योजितम् । ततोऽङ्गधरपूर्वं च पठेत् पूर्वधरध्वनिम् ॥ ४१ ॥ 'अनादिश्रोत्रियाय स्वाहा' ( अनादिकालीन श्रुतके अध्येताको समर्पण करता हूँ ), यह मन्त्रपद बोलना चाहिए । तदनन्तर इसी प्रकार 'स्नातकाय स्वाहा' और 'श्रावकाय स्वाहा' ये दो मन्त्र पढ़ना चाहिए ( केवली अरहन्त और श्रावकके लिए समर्पण करता हूँ ) ||३४|| इसके बाद 'देवब्राह्मणाय स्वाहा' ( देवब्राह्मणके लिए समर्पण करता हूँ), 'सुब्राह्मणाय स्वाहा' ( सुब्राह्मणके लिए समर्पण करता हूँ ), और 'अनुपमाय स्वाहा' ( उपमारहित भगवान् के लिए हवि समर्पित करता हूँ ), ये शब्द बोलना चाहिए ||३५|| तदनन्तर सम्यग्दृष्टि, निधि - पति और वैश्रवण शब्दको दो-दो बार कहकर अन्तमें स्वाहा शब्दका प्रयोग करना चाहिए अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते वैश्रवण वैश्रवण स्वाहा' ( हे सम्यग्दृष्टि निधियों के अधिपति, हे कुबेर, मैं तुम्हें हवि समर्पित करता यह मन्त्र बोलना चाहिए || ३६ || इसके बाद मन्त्रोंको जाननेवाला द्विज पहले के समान काम्यमन्त्र बोले । अब इसके आगे उपासकाध्ययन-शास्त्र के अनुसार ऋषिमन्त्र कहता हूँ ||३७|| जातिमन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है : 'सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, षट्कर्मणे स्वाहा, ग्रामयतये स्वाहा, अनादिश्रोत्रियाय स्वाहा, स्नातकाय स्वाहा, श्रावकाय स्वाहा, देवब्राह्मणाय स्वाहा, सुब्राह्मणाय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते वैश्रवण वैश्रवण स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । ऋषिमन्त्र - प्रथम ही 'सत्यजाताय नमः' ( सत्यजन्मको धारण करनेवालेको नमस्कार हो ) यह पद बोलना चाहिए और उसके बाद 'अर्हज्जाताय नमः' ( अरहन्त रूप जन्मको धारण करनेवाले के लिए नमस्कार हो ) इस पदका उच्चारण करना चाहिए ||३८|| तदनन्तर 'निर्ग्रन्थाय नमः' (परिग्रहरहितके लिए नमस्कार हो), 'वीतरागाय नम:' ( रागद्वेषरहित जिनेन्द्र देवको नमस्कार हो ), 'महाव्रताय नमः' ( महाव्रत धारण करनेवालोंके लिए नमस्कार हो ), 'त्रिगुप्ताय नमः ' ( तीनों गुप्तियोंको धारण करनेवालेके लिए नमस्कार हो, ) 'महायोगाय नमः' ( महायोगको धारण करनेवाले ध्वनियोंको नमस्कार हो) और 'विविधयोगाय नमः' ( अनेक प्रकारके योगोंको धारण करनेवालोंके लिए नमस्कार हो ) ये मन्त्र पढ़ना चाहिए ||३९-४०॥ फिर नमः शब्दके साथ चतुर्थी विभक्त्यन्त विविधद्ध शब्दका पाठ करना चाहिए अर्थात् ' विवि १ पदम् ल० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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