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________________ २९२ आदिपुराणम् ततोऽमराप्रमेयोक्ती सागर्भावासशब्दने । ततोऽक्षोभ्याविलीनोक्ती परमादिर्घनध्वनिः ॥१६॥ पृथक्पृथगिमे शब्दास्तदन्तास्तत्परा मताः । उत्तराण्यनुसंधाय, पदान्येभिः पदैर्वदेत् ॥१७॥ आदौ परमकाष्टेति योगरूपाय वाक्परम् । नमःशब्दमुदीर्यान्ते मन्त्रविन्मन्त्रमुद्धरेत् ॥१८॥ लोकाग्रवासिनेशब्दात्परः कार्यो नमो नमः। एवं परमसिद्धेभ्योऽर्हसिद्धभ्य इत्यपि ॥१९॥ एवं केवलिसिद्धेभ्यः पदाद् भूयोऽन्तकृत्पदात् । सिद्धेभ्य इत्यमुष्माच्च परम्परपदादपि ॥२०॥ अनादिपदपूर्वाच्च तस्मादेव पदात्परम् । अनाद्यनुपमादिभ्यः सिद्धेभ्यश्च नमो नमः ॥२१॥ नमः' ( कर्मरूपी धूलिसे रहित जिनराजको नमस्कार हो ), 'निर्मलाय नमः' ( कर्मरूप मलसे रहित जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो ) 'अच्छेद्याय नमः' ( जिनका कोई छेदन नहीं कर सके ऐसे जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो ), 'अभेद्याय नमः' ( जो किसी तरह भिद नहीं सके ऐसे अरहन्त'को नमस्कार हो ), 'अजराय नमः' (जो बुढ़ापासे रहित है उसे नमस्कार हो), 'अमराय नमः' ( जो मरणसे रहित है उसे नमस्कार हो ), 'अप्रमेयाय नमः' ( जो प्रमाणसे रहित है-छद्मस्थ पुरुषके ज्ञानसे अगम्य है, उसे नमस्कार हो ), 'अगर्भवासाय नमः' ( जो जन्म-मरणसे रहित होनेके कारण किसीके गर्भ में निवास नहीं करते ऐसे जिनराजको नमस्कार हो ), अक्षोभ्याय नमः' ( जिन्हें कोई क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता ऐसे भगवान्को नमस्कार हो ), 'अविलीनाय नमः' ( जो कभी विलीन-नष्ट नहीं होते उन परमात्माको नमस्कार हो) और 'परमघनाय नमः' ( जो उत्कृष्ट घनरूप हैं-उन्हें नमस्कार हो ) इन अव्याबाध आदि शब्दोंके आगे चतुर्थीविभक्ति तथा नमः शब्द लगाकर ऊपर लिखे अनुसार अव्याबाधाय नमः आदि मन्त्र पदोंका उच्चारण करना चाहिए ॥१४-१७॥ तदनन्तर मन्त्रको जाननेवाला द्विज जिसके आदिमें 'परमकाष्ठ' है और अन्तमें योगरूपाय है ऐसे शब्दका उच्चारण कर उसके आगे 'नमः' पद लगाता हुआ 'परमकाष्ठयोगाय नमः' ( जिनका योग उत्कृष्ट सीमाको प्राप्त हो रहा है ऐसे जिनेन्द्रको नमस्कार हो ) इस मन्त्रका उद्धार करे ॥१८॥ फिर लोकाग्रवासिने शब्दके आगे 'नमो नमः' लगाना चाहिए इसी प्रकार परम सिद्धेभ्यः और अर्हत्सिद्धेभ्यः शब्दोंके आगे भी नमो नमः शब्दका प्रयोग करना चाहिए अर्थात् क्रमसे 'लोकाग्रवासिने नमो नमः' ( लोकके अग्रभागपर निवास करनेवाले सिद्ध परमेष्ठीको बार-बार नमस्कार हो ) 'परमसिद्धेभ्यो नमो नमः' ( परम सिद्धभगवान्को बार-बार नमस्कार हो ) और 'अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः' ( जिन्होंने अरहन्त अवस्थाके बाद सिद्ध अवस्था प्राप्त की है ऐसे सिद्ध महाराजको बार-बार नमस्कार हो ) इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिए ॥१९॥ इसी प्रकार 'केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः' ( केवली सिद्धोंको नमस्कार हो ) 'अन्तःकृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः' ( अन्तकृत् केवली होकर सिद्ध होनेवालोंको नमस्कार हो ), 'परम्परसिद्धेभ्यो नमः' ( परम्परासे हुए सिद्धोंको नमस्कार हो ) 'अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमः' ( अनादि कालसे हुए परम सिद्धोंको नमस्कार हो, ) और 'अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमो नमः' ( अनादिकालसे हुए उपमारहित सिद्धोंको नमस्कार हो ) इन मन्त्र पदोंका उच्चारण कर नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिए। इन नीचे लिखे शब्दोंको सम्बोधनरूपसे दो-दो बार बोलना चाहिए । प्रथम ही हे सम्यग्दृष्टे हे सम्यग्दृष्टे, हे आसन्नभव्य १ अमराप्रमेयशब्दौ । २ सागर्भावासशब्दसहिते। ३ परमघनशब्दः । ४ अव्याबाधपदमित्यादयः । ५ चतुर्थ्यन्ताः । ६.नमःशब्दपराः । ७ परम्परशब्दात् । ८ सिद्धेभ्य इति पदात् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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