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________________ आदिपुराणम् ७ .११ 93 'फणमात्रोद्गता रन्ध्रात्' फणिनः शितयोऽयुतन् । कृताः कुवलयैरर्घा मुनेरिव पदान्तिके ॥ १७२ ॥ रेजुवनलता नम्रैः शाखाग्रैः कुसुमोज्ज्वलैः । मुनिं मजन्स्यो भक्त्येव पुष्पार्धेर्नतिपूर्वकम् ॥१७३॥ शश्वद्विकासिकुसुमैः शाखाद्यैरनिलाहतैः । बभुर्वनद्रुमास्तोषान्निनृत्सव इवासकृत् ॥१७४॥ कलैरलिरुतोद्गानैः फणिनो ननृतुः किल । उत्फणाः फणरत्रांशुदीप्रै मोंगे विवर्तितैः ॥ १५५॥ पुंस्कोकिलकलालापडिण्डिमानुगतैर्लयैः । 'चक्षुःश्रवस्तु पश्यत्सु तद्विषोऽनटिषु र्मुहुः ॥ १७६ ॥ महिम्ना शमिनः” शान्तमित्यभूत्तच्च काननम् । धत्ते हि महतां योगः शममप्यशमात्मसु ॥ १७७॥ शान्तस्वनैर्नदन्ति स्म वनान्तेऽस्मिन् शकुन्तयः । घोषयन्त इवात्यन्तं शान्तमेतत्तपोवनम् ॥१७८॥ तपोनुभावादस्यैवं प्रशान्तेऽस्मिन् वनाश्रये । विनिपातः " कुतोऽध्यासीत् कस्यापि न कथञ्चन ॥ १७६ ॥ "महसास्य तपोयोगजृम्भितेन महीयसा । बभूवुर्हतहृदूध्वान्ताः तिर्यञ्चोऽप्यनमिद्रुहः ॥ १८० ॥ गतिस्खलनतो ज्ञात्वा योगस्थं तं मुनीश्वरम् । असकृत्पूजयामासुंरवतीर्य नभश्चराः ॥ १८१ ॥ महिम्नाऽस्य तपोवीर्यजनितेनालघीयसा । मुहुरासनकम्पोऽभूनतमूर्ध्ना सुधाशिनाम् ॥ १८२ ॥ २१६ 7 1४ तपश्चरण कैसी शान्ति उत्पन्न करनेवाला है, ॥ १७० ॥ वे मुनिराज चरणोंके समीप आये हुए सर्पों के काले फणाओंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पूजाके लिए नीलकमलोंकी मालाएँ ही बनाकर रखी हों ॥ १७१ ॥ बामीके छिद्रोंसे जिन्होंने केवल फणा ही बाहर निकाले हैं ऐसे काले सर्प उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो मुनिराजके चरणोंके समीप किसीने नील-कमलोंका अर्घ ही बनाकर रखा हो ॥ १७२ ॥ वनकी लताएँ फूलोंसे उज्ज्वल तथा नीचेको झुकी हुई छोटी छोटी डालियोंसे ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थीं मानो फूलोंका अर्घं लेकर भक्ति से नमस्कार करती हुई मुनिराजकी सेवा ही कर रही हों ।। १७३ ।। वनके वृक्ष, जिनपर सदा फूल खिले रहते हैं और जो वायुसे हिल रहे हैं ऐसे शाखाओं के अग्रभागोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सन्तोषसे बार-बार नृत्य ही करना चाहते हों ॥ १७४॥ जिनके फणा ऊँचे उठ रहे हैं ऐसे सर्प, भ्रमरोंके शब्दरूपी सुन्दर गानेके साथ-साथ फणाओंपर लगे हुए रत्नोंकी किरणोंसे देदीप्यमान अपने फणाओंको घुमा घुमाकर नृत्य कर रहे थे ॥ १७५॥ मोर, कोकिलोंके सुन्दर शब्दरूपी डिण्डिम बाजेके अनुसार होनेवाले लयके साथ-साथ सपके देखते रहते भी बार-बार नृत्य कर रहे थे || १७६ || इस प्रकार अतिशय शान्त रहनेवाले उन मुनिराज माहात्म्यसे वह वन भी शान्त हो गया था सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुषों का संयोग क्रूर जीवोंमें भी शान्ति उत्पन्न कर देता है || १७७ || इस वनमें अनेक पक्षी शान्त शब्दोंसे चहक रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो इस बात की घोषणा ही कर रहे हों कि यह तपोवन अत्यन्त शान्त है ॥१७८॥ उन मुनिराजके तपके प्रभावसे यह वनका आश्रम ऐसा शान्त हो गया था कि यहाँ के किसी भी जीवको किसीके भी द्वारा कुछ भी उपद्रव नहीं होता था ॥ १७९ ॥ तप सम्बन्धसे बढ़े हुए मुनिराज के बढ़े भारी तेजसे तियंचोंके भी हृदयका अन्धकार दूर हो गया था और अब वे परस्पर में किसीसे द्रोह नहीं करते थे - अहिंसक हो गये थे || १८० ॥ विद्याधर लोग गति भंग हो जानेसे उनका सद्भाव जान लेते थे और विमानसे उतरकर ध्यान - में बैठे हुए उन मुनिराजकी बार-बार पूजा करते थे || १८१ ॥ तपकी शक्ति से उत्पन्न हुए मुनिराजके बड़े भारी माहात्म्यसे जिनके मस्तक झुके हुए हैं ऐसे देवोंके आसन भी बार-बार कम्पाय १ वल्मीकविलात् । २ कृष्णाः । ३ नर्तितुमिच्छवः । ४ - दुगीतैः ल० । ५ दीप्तै - ६०, ल० । ६ शरीरैः । ७ तालनिबद्धैः । ८ सर्पेषु । 'कुण्डली गूढपाच्चक्षुःश्रवाः काकोदरः फणी' इत्यभिधानात् । ९ सर्पद्विषः । मयूरा इत्यर्थः । १० नन्ति स्म । ११ यतेः । १२ संयोगः । १३ क्रूरस्वरूपेषु । १४ अत्यन्तं प्रसन्नम् । १५ बाधेत्यर्थः । १६ तेजसा । १७ अहिंसकाः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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