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________________ षट्त्रिंशत्तम पर्व २१७ विद्याधर्यः कदाचिच्च क्रीडाहेतोरुपागताः । वल्लीरुद्वेष्टयामासु'मुनेः सर्वाङ्गसंगिनीः ॥१८३॥ इत्युपारूढ सद्ध्यानबलोद्भूततपोबलः । स लेश्याशुद्धिमास्कन्दन शुक्लध्यानोन्मुखोऽभवत् ॥१८॥ वत्सरानशनस्यान्ते भरतेशेन पूजितः । स भेजे परमज्योतिः केवलाख्यं यदक्षरम् ॥१८॥ संक्किष्टो भरताधीशः सोऽस्मत इति यत्किल । हृद्यस्य हार्द तेनासीत् तत्पूजाऽपेक्षि केवलम् ॥१८६ केवलार्कोदयात् प्राक्च पश्चाच्च विधिवद् व्यधात् । सपर्या भरताधीशो योगिनोऽस्य प्रसमधीः ॥१८७॥ "स्वागःप्रमार्जनार्थेज्या''प्राक्तनी भरतेशिनः । 'पाश्चात्त्याऽत्यायताऽपीज्या केवलोत्पत्तिमन्वभूत् ॥ या कृता भरतेशेन महेज्या स्वानुजन्मनः । प्राप्तकेवलबोधस्य को हि तवर्णने क्षमः ॥१८९॥ "स्वजन्मानुगमोऽस्त्येको धर्मरागस्तथाऽपरः । जन्मान्तरानुबन्धश्च प्रेमबन्धोऽतिनिर्भरः ॥१०॥ " इत्येकशोऽप्यमी मतिप्रकर्षस्य प्रयोजकाः। तेषां नु सर्वसामग्री का न पुष्णाति सक्रियाम् ॥१९॥ सामात्यः समहीपाल सान्तःपुरपुरोहितः। तं बाहुबलियोगीन्द्र प्रणनामाधिराट् मुदा ॥१९॥ मान होने लगते थे ॥१८२॥ कभी-कभी क्रीड़ाके हेतुसे आयी हुई विद्याधरियाँ उनके सर्व शरीरपर लगी हुई लताओंको हटा जाती थीं ॥१८३॥ इस प्रकार धारण किये हुए समीचीनधर्मध्यानके बलसे जिनके तपकी शक्ति उत्पन्न हुई है ऐसे वे मुनि लेश्याकी विशुद्धिको प्राप्त होते हुए शुक्लध्यानके सम्मुख हुए ॥१८४॥ एक वर्षका उपवास समाप्त होनेपर भरतेश्वरने आकर जिनकी पूजा की है ऐसे महामुनि बाहुबली कभी नष्ट नहीं होनेवाली केवलज्ञानरूपी उत्कृष्ट ज्योतिको प्राप्त हुए । भावार्थ - दीक्षा लेते समय बाहुबलीने एक वर्षका उपवास किया था। जिस दिन उनका वह उपवास पूर्ण हुआ उसी दिन भरतने आकर उनकी पूजा की और पूजा करते ही उन्हें अविनाशी उत्कृष्ट केवलज्ञान प्राप्त हो गया ॥१८५॥ वह भरतेश्वर मुझसे संक्लेशको प्राप्त हुआ है अर्थात् मेरे निमित्तसे उसे दुःख पहुँचा है यह विचार बाहुबलीके हृदयमें विद्यमान रहता था, इसलिए केवलज्ञानने भरतकी पूजाकी अपेक्षा की थी। भावार्थ - भरतके पूजा करते ही बाहुबलीका हृदय निश्चिन्त हो गया और उसी समय उन्हें केवलज्ञान भी प्राप्त हो गया ॥१८६।। प्रसन्न है बुद्धि जिसकी ऐसे सम्राट भरतने केवलज्ञानरूपी सूर्यके उदय होनेके पहले और पीछे-दोनों ही समय विधिपूर्वक उन मुनिराजकी पूजा की थी ॥१८७॥ भरतेश्वरने केवलज्ञान उत्पन्न होनेके पहले जो पूजा की थी वह अपना अपराध नष्ट करनेके लिए की थी और केवलज्ञान होनेके बाद जो बड़ी भारी पूजा की थी वह केवलज्ञानकी उत्पत्तिका अनुभव करनेके लिए की थी ॥१८८॥ जिन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे अपने छोटे भाई बाहुबलीकी भरतेश्वरने जो बड़ी भारी पूजा की थी उसका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥१८९।। प्रथम तो बाहुबली भरतके छोटे भाई थे, दूसरे भरतको धर्मका प्रेम बहुत था, तीसरे उन दोनोंका अन्य अनेक जन्मोंसे सम्बन्ध था, और चौथे उन दोनोंमें बड़ा भारी प्रेम था इस प्रकार इन चारों में से एक-एक भी भक्तिकी अधिकताको बढ़ानेवाले हैं, यदि यह सब सामग्रो एक साथ मिल जाये तो वह कौन-सी उत्तम क्रियाको पुष्ट नहीं कर सकती अर्थात् उससे कौन-सा अच्छा कार्य नहीं हो सकता ? ॥१९०-१९१॥ सम्राट भरतेश्वरने १ मोचयामासुः । २ प्रकटीभूत । ३ गच्छन् । ४ मत् । ५ भुजबलिनः । ६ स्नेहः । 'प्रेमा ना प्रियता हार्द प्रेम स्नेहः' इत्यभिधानात् । ७ हार्दैन। ८ भरतपूजापेक्षि। ९ केवलज्ञानम् । १० निजापराधनिवारणार्था । ११ प्राग्भवा । १२ पश्चाद्भवा । १३ अत्यधिका । १४ निजजननेन । १५ अनुगमनम् । सहोत्पत्ति रित्यर्थः । ९६ - नुबद्धश्च ब०, अ०, स०, ५०,०। १७ एकैकमपि । १८ महीपालैः सहितः । २८
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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