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________________ त्रिंशत्तमं अनित्यान्राणसंसारैकत्वाऽन्यत्वान्यशौचताम् । निर्जरात्रवसंरो' धलोकस्थित्यनुचिन्तनम् ॥१५९॥ धर्मस्याख्याततां बोधेर्दुर्लभत्वं च लक्षयन् । सोऽनुप्रेक्षाविधि 'दध्यौ विशुद्धं द्वादशात्मकम् ॥ १६०॥ आज्ञा पायौ विपाकं च संस्थानं चानुचिन्तयन् । सध्यानमभजद् धर्म्यं कर्माशान् परिशातयन् ॥ १६१॥ दीपिकायामिवामुष्यां ध्यानदीप्तौ निरीक्षिताः । क्षणं विशीर्णाः कर्माशाः कजलांशा इवाभितः ॥ १६२ ॥ प्रस दिखेषु परिस्फुरन् । तद्वनं गारुडग्रावच्छायातत मिवातनोत् ॥ १६३ ॥ तत्पदान्तविश्रान्ता विन्धा मृगजातयः । वाधिरे मृगैर्नान्यैः क्रूरैरक्रूरतां श्रितैः ॥ १६४ ॥ विरोधिनोऽप्यमी मुक्तविरोध स्वैरमासिताः । तस्योपाङ्ङ्घीभसिंहाद्याः शशंसुर्वैभवं मुनेः ॥ १६५॥ 'जरजम्बूकमाघ्राय मस्तके व्याघ्रधेनुका । स्वशावनिर्विशेषं तामपीष्यत् "स्तन्यमात्मनः ॥ १६६॥ करिणो हरिणारातीनन्त्रीयुः सह यूथपैः । स्तनपानोत्सुका भेजुः करिणीः सिंहपोतकाः ॥ १६७ ॥ कलभान् "कलभाङ्कार मुखरान् नखरैः खरैः । कण्ठीरवः स्पृशन् कण्ठे नाभ्यनन्दिन यूथपैः ॥ १६८ ॥ करिण्यो विसिनीपत्रपुटैः पानीयमानयत् । तद्योगपीठपर्यन्तभुवः सम्मार्जनेच्छया ॥ १६९॥ १ १२ 12 १६ "पुष्करैः पुष्करोदस्तै यस्तैरधिपदद्वयम् । स्तम्बेरमा मुनिं भेजुरहो शमकरं तपः ॥ १७० ॥ १७ उपाधि भोगिनां भोगैर्विनीलैर्व्यरुवन्मुनिः । विन्यस्तैरर्चनायेव नीलैरुत्पलदामकैः ॥ १७१ ॥ २१५ अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आसूव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्माख्यातत्व इन बारह भावनाओंका उन्होंने विशुद्ध चित्तसे चिन्तवन किया था ॥१५९–१६०।। वे आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थानका चिन्तवन करते हुए तथा कर्मोंके अंशोंको क्षीण करते हुए धर्मध्यान धारण करते थे ॥ १६९ ॥ जिस प्रकार दीपिकाके प्रज्वलित होनेपर उसके चारों ओर कज्जलके अंश दिखाई देते हैं उसी प्रकार उनकी ध्यानरूपी दीपिका के प्रज्वलित होनेपर उसके चारों ओर क्षणभर नष्ट हुए ।। १६२ || सब दिशाओं में फैलता हुआ उनके शरीरकी दीप्तिका की कान्तिसे व्याप्त हुआ-सा बना रहा था ॥ १६३ ॥ | उनके चरणोंके समीप विश्राम करनेवाले मृग आदि पशु सदा विश्वस्त अर्थात् निर्भय रहते थे, उन्हें सिंह आदि दुष्ट जीव कभी बाधा नहीं पहुँचाते थे क्योंकि वे स्वयं वहाँ आकर अक्रूर अर्थात् शान्त हो जाते थे ।। १६४।। उनके चरणोंके समीप हाथी, सिंह आदि विरोधी जीव भी परस्परका वैर-भाव छोड़कर इच्छानुसार उठतेबैठते थे और इस प्रकार वे मुनिराजके ऐश्वर्यको सूचित करते थे ।। १६५ || हालकी ब्यायी हुई सिंही भैंसेके बच्चेका मस्तक सूँघकर उसे अपने बच्चे के समान अपना दूध पिला रही थी ॥ १६६ ॥ हाथी अपने झुण्डके मुखियोंके साथ-साथ सिंहोंके पीछे-पीछे जा रहे थे और स्तन - के पीनेमें उत्सुक हुए सिंहके बच्चे हथिनियोंके समीप पहुँच रहे थे ।। १६७॥ बालकपनके कारण मधुर शब्द करते हुए हाथियोंके बच्चोंको सिंह अपने पैने नाखूनोंसे उनकी गरदनपर स्पर्श कर रहा था और ऐसा करते हुए उस सिंहको हाथियोंके सरदार बहुत ही अच्छा समझ रहे थे उसका अभिनन्दन कर रहे थे ॥ १६८ ॥ उन मुनिराजके ध्यान करनेके आसन के समीपकी भूमिको साफ करनेकी इच्छासे हथिनियाँ कमलिनीके पत्तोंका दोना बनाकर उनमें भर-भरकर पानी ला रही थीं ॥ १६९ ॥ हाथी अपने सूँड़के अग्रभागसे उठाकर लाये हुए कमल उनके दोनों चरणोंपर रख देते थे और इस तरह वे उनकी उपासना करते थे । अहा, — कर्मोंके अंश दिखाई देते थे समूह उस वनको नीलमणि १ संवर । २ ध्यायति स्म । ३ आज्ञाविचयापायविचयौ । ४ कृशीकुर्वन् । ५ व्याप्तम् । ६ निश्चलाः । ७ विरोधाः ल०, प०, अ०, स० द०, ८ जरज्जन्तुक ल०, इ० । जरत् वृद्ध । ९ नवप्रसूतव्याघ्री । १० समानम् । ११ पाययति स्म । १२ स्तनक्षीरम् । १३ मनोज्ञ ध्वनि निविशेषान् । १४ द्वौ नत्री पूर्वमर्थं गमयतः, अभ्यनन्दीदित्यर्थः । १५ कमलैः । १६ कराग्रोद्धतः । १७ सर्पाणां शरीरैः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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