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________________ पत्रिंशत्तमं पर्व २०३ एवं' प्रायैर्जनालापमहीनाथा विनोदिताः । द्रुतं प्रापुस्तमुद्देशं यत्र वीराग्रणीरसौ ॥३४॥ दोर्दपं विगणय्यास्य दुर्बिलङ्घ यमरातिभिः । त्रेसुः प्रतिभटाः प्रायस्त स्मिन्नासन्नसंनिधौ ॥३५॥ इत्यभ्यणे बले जिष्णो बलं भुजबलीशिनः । जलमब्धेरिवाक्षुभ्यद् वीरध्वाननिरुन्द्वदिक् ॥३६॥ अधीभयबले धीराः संनद्धगजवाजयः । बलान्यारचयामासुरन्योऽन्यं प्रयुयुत्सया” ॥३७॥ तावच्च मन्त्रिणो मुख्याः संप्रधार्यावदन्निति । शान्तये नैनयोयुद्ध" ग्रहयोः क्ररयोरिव ॥३८॥ चरमगात्रधरावेतौ नानयोः काचन क्षतिः । क्षयो जनस्य पक्षस्य ब्याजेनानेन जम्भितः ॥३६॥ इति निश्चित्य मन्त्रज्ञा भीत्वा भूयो जनक्षयात् । तयोरनुमतिं लब्ध्वा धम्यं रणमघोषयन् ॥४०॥ अकारणरणेनालं जनसंहारकारिणा । महानेव' मधर्मश्च गरीयांश्च यशोवधः ॥४१॥ बलोत्कर्षपरीक्षेयमन्यथाऽप्युपपद्यते । तदस्तु युवयोव मिथो युद्धं त्रिधात्मकम् ॥४२॥ भ्रभङ्गेन विना भङ्गः सोढव्यो युवयोरिह । विजयश्च विनोत्सेकात् धर्मो ह्येष सनाभिपु ॥४३॥ इत्युक्ती पार्थिवैः सर्वैः सोपरोधैश्च मन्त्रिभिः । तो कृच्छात् प्रत्यपत्साता तादृशं युद्धमुद्धतौ ॥४४॥ और कितने ही पक्षपातसे प्रेरित होकर अपने ही पक्षकी प्रशंसा कर रहे थे ॥३३॥ प्रायः लोगोंके इसी प्रकारके वचनोंसे मन बहलाते हुए राजा लोग शीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ वीरशिरोमणि कुमार बाहुबली पहलेसे विराजमान था ॥३४।। बाहुबलीके समीप पहुँचते ही भरतके योद्धा, जिसका शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते ऐसा बाहुबलीकी भुजाओंका दर्प देखकर प्रायः कुछ डर गये ।।३५॥ इस प्रकार चक्रवर्ती भरतकी सेनाके समीप पहुँचनेपर वीरोंके शब्दोंसे दिशाओंको भरनेवाली बाहुबलीकी सेना समुद्र के जलके समान क्षोभको प्राप्त हुई ॥३६॥ अथानन्तर - दोनों ही सेनाओं में जो शूरवीर लोग थे वे परस्पर युद्ध करनेकी इच्छासे अपने हाथी घोड़े आदि सजाकर सेनाकी रचना करने लगे - अनेक प्रकारके व्यूह आदि बनाने लगे ॥३७।। इतनेमें ही दोनों ओरके मुख्य-मुख्य मन्त्री विचारकर इस प्रकार कहने लगे कि क्रूरग्रहोंके समान इन दोनोंका युद्ध शान्तिके लिए नहीं है ॥३८॥ क्योंकि ये दोनों ही चरम शरीरी हैं, इनकी कुछ भी क्षति नहीं होगी, केवल इनके युद्धके बहानेसे दोनों ही पक्षके लोगोंका क्षय होगा ॥३९॥ इस प्रकार निश्चय कर तथा भारी मनुष्योंके संहारसे डरकर मन्त्रियोंने दोनोंकी आज्ञा लेकर धर्मयुद्ध करनेकी घोषणा कर दी ॥४०॥ उन्होंने कहा कि मनुष्योंका संहार करनेवाले इस कारणहीन युद्धसे कोई लाभ नहीं है क्योंकि इसके करनेसे बड़ा भारी अधर्म होगा और यशका भी बहुत विघात होगा ॥४१।। यह बलके उत्कर्षकी परीक्षा अन्य प्रकारसे भी हो सकती है इसलिए तुम दोनोंका ही परस्पर तीन प्रकारका युद्ध हो ॥४२॥ इस युद्ध में जो पराजय हो वह तुम दोनोंको भौंहके चढ़ाये बिना ही - सरलतासे सहन कर लेना चाहिए तथा जो विजय हो वह भी अहंकारके बिना तुम दोनोंको सहन करना चाहिए क्योंकि भाई भाइयोंका यही धर्म है ॥४३।। इस प्रकार जब समस्त राजाओं और मन्त्रियोंने बड़े आग्रहके साथ कहा तब कहीं बड़ी कठिनतासे उद्धत हुए उन दोनों भाइयोंने वैसा युद्ध करना स्वीकार १ एवमाद्यः । २ प्राप्ता ल०, प०, द० । ३ भुजबली स्थितः । ४ विचार्य । ५ बाहुबलिनि । ६ अत्यासन्ने सति। ७ भरतस्य । ८ वीराः ल०, द०, अ०, प०, स०, इ०। ९ वाजिनः अ०, स०, द० । १० प्रकर्षेण योद्धमि. च्छया । ११ नावयो - ल० । १२ सहायस्य । १३ युद्धच्छलेन । १४ एवं सति । युद्धे सतीत्यर्थः । १५ कीतिनाशः । १६ घटते इत्यर्थः । १७ तत् कारणात् । १८ क्रोधाभावेनेत्यर्थः । १९ ग भावादित्यर्थः । २० अनुमेनाते।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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