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________________ १९६ आदिपुराणम् कमलनलिनी नालं वेष्टुं बत प्रविकस्वरं गतमरुणतां बालार्कस्य प्रसारिभिरंशुभिः । परिगतमिव प्रादुप्यद्भिः कणैरनिलार्चिषां नियतविपदं धिग् व्यामूढिं विवेकपराङ्मुखीम् ॥२३५॥ उपनततरूनाधुन्वाना विलोलितषट्पदाः कृतपरिचया वीची चक्रः सरस्सु सरोरुहाम् । रतिपरिमलानाकर्षन्तः सरोजरजो जडाः प्रतिदिशममी मन्दं वान्ति प्रगतनमारुताः ॥२३६॥ मालिनीच्छन्दः नृपयर जिनभर्तुर्मङ्गलैरेभिरिटैः प्रकटितजयघोषस्त्वं विबुध्यस्व भूयः । भवति निखिलविघ्नप्रप्रशान्तिर्यतस्त रणशिरसि जयश्रीकामिनी कामुकस्य ॥२३७॥ जयति दिविजनाथैः प्राप्तपूजद्धिरहन् धुतदुरितपरागो वीतरागोऽपरागः । कृतनतिशतयज्व प्रज्वलन्मौलिरत्न च्छुरितरुचिररोचिर्मञ्जरी पिञ्जराङ्घ्रिः ॥२३॥ शोभा फैलाती हुई, दिशारूपी हाथियोंके मुखपर सिन्दूरके समान दिखनेवाली, महावरके समान गुलाबी और दिशाओंके मुखोंको अलंकृत करनेवाली यह प्रभात-सन्ध्याकी कान्ति चारों ओर बड़ी तेजीसे फैल रही है ।।२३४॥ हे नाथ, यह खिला हुआ कमल लाल सूर्यकी फैलनेवाली किरणोंसे लाल-लाल हो रहा है और ऐसा मालूम होता है मानो अग्निके फैलते हुए फुलिंगोंसे व्याप्त ही हो रहा हो तथा इसी भयसे यह भ्रमरी उसमें प्रवेश करनेके लिए समर्थ नहीं हो रही है । आचार्य कहते हैं कि जिसमें आपत्ति सदा निश्चित रहती है और जो विवेकसे पराङ्मुख है ऐसी मूर्खताको धिक्कार है ॥२३५।। हे राजन्, जो उपवनके वृक्षोंको हिला रहा है, भ्रमरोंको चंचल कर रहा है, जिसने कमलोंके तालाबमें लहरोंके साथ परिचय प्राप्त किया है, जो स्त्री-पुरुषोंके संभोगकी सुगन्धिको खींच रहा है, और जो कमलोंके परागसे भारी हो रहा है ऐसा यह प्रातःकालका वायु सब दिशाओंमें धीरे-धीरे बह रहा है ।।२३६।। हे राजाओंमें श्रेष्ठ, जिनमें जय-जयकी घोषणा प्रकट रूपसे की गयी है ऐसे जिनेन्द्र भगवान्के इन इष्ट मंगलोंसे आप फिरसे जग जाइए क्योंकि इन्हीं मंगलोंके द्वारा रणके अग्रभागमें विजयलक्ष्मी रूपी स्त्रीको चाहनेवाले आपके समस्त विघ्नोंकी अच्छी तरह शान्ति होगी ॥२३७॥ __ अनेक इन्द्रोंके द्वारा जिन्हें पूजाकी ऋद्धि प्राप्त हुई है, जिन्होंने पापरूपी धूल नष्ट कर डाली है, जो कीतराग हैं - जिन्होंने रागद्वेष नष्ट कर दिये हैं और नमस्कार करते हुए इन्द्रोंके देदीप्यमान मुकुटके रत्नोंसे मिली हुई सुन्दर किरणोंकी मंजरीसे जिनके चरण कुछ-कुछ पीले हो १ असमर्थः। २ प्रवेशाय। ३ व्याप्तम् । ४ सुरतसमये दम्पत्यनुभुक्तकस्तुरीकर्पूरादिपरिमलान् । ५ मन्दाः । ६ प्रातःकाले भव । ७ वीतरागद्वेषः । ८ इन्द्र । ९ व्याप्त ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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