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________________ पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व अयमनुसरन् कोकः कान्तां तटान्तरशायिनी मविरल गलद्वाष्पव्याजादिवोत्सृजती शुचम् । विशति बिसिनीपत्रच्छन्नां सरोजसरस्तटीं सरसिजरजःकीर्णो पक्षी विध्य शनैः शनैः ॥२३०॥ जस्ठबिसिनीकन्दच्छायामुषस्तरलास्विष स्तुहिनकिरणो दिक्पर्यन्तादयं प्रतिसंहरन् । अनुकुमुदिनीषण्डं तन्वन् करानमृतश्च्युतो दृढयति परिवङ्गासंगं वियोगभयादिव ॥२३॥ तिमिरकरिणां यूथं भित्वा तदनपरिप्लुता मिव तनुमयं बिभ्रच्छोणां निशाकरकसरी । वनमिव नभः क्रान्त्वाऽस्ताद्रेणुहागहनान्यतः श्रयति नियतं 'निद्रासंगाद् विजिमिततारकः ॥२३२॥ सरति सरसीतीरं हंसः ससारसकूजितं झटिति घटते कोकद्वन्द्वं विशापमिवाधुना। पतति पततां वृन्दं विष्वक मंषु कृतारुतं' गतमिव जगत्प्रत्यापत्ति समुद्यति भास्वति ॥२३३॥ उदयशिखरिग्रावश्रेणीसरोरुहरागिणी गगनजलधेरातन्वाना प्रवालवनश्रियम् । दिगिभवदने सिन्दूरश्रीरलक्तकपाटला प्रसरतितरां सम्ध्यादीप्तिदिगाननमण्डनी' ॥२३४॥ अगवानी ही कर रहे हों ॥२२९।। इधर देखिए, जो दूसरे किनारेपर सो रही है और निरन्तर बहते हुए आँसुओंके बहानेसे जो मानो शोक ही छोड़ रही है ऐसी अपनी स्त्री चकवीके 'पीछेपीछे जाता हुआ यह चकवा कमलोंके परागसे भरे हुए अपने दोनों पंखोंको झटकाकर कमलिनियोंके पत्तोंसे ढके हुए कमलसरोवरके तटपर धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा है ॥२३०। यह चन्द्रमा पके हुए मृणालकी कान्तिको चुरानेवाली अपनी कान्तिको सब दिशाओंके अन्तसे खींच रहा है तथा अमृत बरसानेवाली अपनी किरणोंको प्रत्येक कुमुदिनियोंके समूहपर फैलाता हुआ वियोगके डरसे ही मानो उनके साथ आलिङ्गनके सम्बन्धको दृढ़ कर रहा है ॥२३१॥ जो अन्धकाररूपी हाथियोंके समूहको भेदन कर उनके | रक्तसे ही तर हुएके समान लाल-लाल दिखनेवाले शरीर ( मण्डल ) को धारण कर रहा है तथा नींद आ जानेसे जिसकी नक्षत्ररूपी आँखोंको पुतलियाँ तिरोहित अथवा कुटिल हो रही हैं ऐसा यह चन्द्रमारूपी सिंह वनके समान आकाशको उल्लंघन कर अब अस्ताचलकी गुहारूप एकान्त स्थानका निश्चित रूपसे आश्रय ले रहा है ।।२३२।। सूर्य उदय होते ही हंस, सारस पक्षियोंकी बोलीसे सहित सरोवरके किनारेपर जा रहे हैं, चकवा चकवियोंके जोड़े परस्पर में इस प्रकार मिल रहे हैं मानो अब उनका शाप ही दूर हो गया हो, पक्षियोंके समूह चारों ओर शब्द करते हुए वृक्षोंपर पड़ रहे हैं और यह जगत् फिरसे अपने पहले रूपको प्राप्त हुआ-सा जान पड़ता है ॥२३३॥ उदयाचलकी चट्टानोंपर पैदा होनेवाले कमलोंके समान लाल तथा आकाशरूपी समुद्रमें मूंगाके वनकी १ अभिनिवेशात् । २ वक्रिततारकः । अक्षःकनीनिकेति ध्वनिः । ३ विगतशापम् । आक्रोशमित्यर्थः । ४ आश्रयति । ५ पक्षिणाम् । ६ कृतसमन्ताद् ध्वनिः । कृतारवं ल० । ७ पूर्वस्थितिम् । ८ उदिते सति । ९ आदित्ये। १० विद्रुमं । ११ मण्डयतीति मण्डनी।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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