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________________ आदिपुराणम् तमः कवाटमुद्राव्य दिङ्मुखानि प्रकाशयन् । जगदुद्घाटिताक्षं वा व्यधादुषणकरः करैः ॥२२॥ प्रातस्तरामथोत्थाय पद्माकरपरिग्रहम् । तन्धन् भानुः प्रतापेन जिगीषोवृत्तिमन्वगात् ॥२२५॥ सुकण्ठा पेठुरत्युच्चैः प्रभोः प्राबोधिकास्तदा। स्वयं प्रबुद्धमप्येनं प्रबोधेनें युयुक्षवः ॥२२६॥ wwwarrrrrrrrrrrorawww. हरिणीच्छन्दः अशिशिरकरो लोकानन्दी जनैरभिनन्दितो बहुमतकरं तेजस्तन्वन्नितोऽयमुदेष्यति । नृवर जगतामुद्योताय स्वमप्युदयोचितं विधिमनुसरन् शय्योत्संगं जहीहि मुदे श्रियः ॥२२७॥ कतरकतम नाक्रान्तास्ते बलैबलशालिनो भुजबलमिदं लोकः प्रायो न वेत्ति तवाल्यकः । भरतपतिना सार्द्ध युद्धे जयाय कृतोद्यमो नृपवर भवान् भूयाद् भर्ता नृवीरजयश्रियः ॥२२८॥ रविरविरलानश्रन् जातानिवाश्रमशाखिनां ___ तुहिनकणिकपाताना* प्रमृज्य करोत्करैः । अयमुदयति प्राप्तानन्दरितोऽम्बुजिनीवनैः ___ उदयसमये प्रत्युद्यातो" कृतार्वमिवाऽम्बुजैः ॥ २२९॥ होते ही चाँदनीकी शोभाको भी चुराता जाता था – नष्ट करता जाता था ॥२२३॥ सूर्यने अपने किरणरूपी हाथोंसे अन्धकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओंके मुंह प्रकाशित कर दिये थे और समस्त जगत् नेत्र खोल दिये थे ॥२२४॥ वह सूर्य विजयकी इच्छा करनेवाले किसी राजाकी वृत्तिका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार विजयकी इच्छा करनेवाला राजा बड़े सबेरे उठकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् लक्ष्मीका हाथ स्वीकार करता है उसी प्रकार सूर्य भी बड़े सबेरे उदय होकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् कमलोंके समूहको स्वीकार कर रहा था - अपने तेजसे उन्हें विकसित कर रहा था ॥२२५।। यद्यपि उस समय महाराज बाहुबली स्वयं जाग गये थे तथापि उन्हें जगानेका उद्योग करते हुए सुन्दर कण्ठवाले बन्दीजन जोर-जोरसे नीचे लिखे हुए मंगलपाठ पढ़ रहे थे ॥२२६॥ हे पुरुषोत्तम, जो लोगोंको आनन्द देनेवाला है और लोग जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसा यह सूर्य सब लोगोंको अच्छा लगनेवाले तेजको फैलाता हुआ इधर पूर्व दिशासे उदय हो रहा है इसलिए आप भी जगत्को प्रकाशित और लक्ष्मीको आनन्दित करनेके लिए सूर्योदयके समय होनेवाली योग्य क्रियाओंको करते हुए शय्याका मध्यभाग छोड़िए ॥२२७॥ हे राजाओंमें श्रेष्ठ, आपकी सेनाओंने कितने-कितने बलशाली राजाओंपर आक्रमण नहीं किया है, ये छोटे-छोटे लोग प्रायः आपकी भुजाओंके बलको जानते भी नहीं हैं । हे नरवीर, आपने भरतेश्वरके साथ युद्ध में विजय प्राप्त करनेके लिए उद्यम किया है इसलिए विजयलक्ष्मीके स्वामी आप ही हों ।।२२८॥ हे देव, बगीचेके वृक्षोंपर पड़ी हुई ओसकी बूंदोंको निरन्तर पड़ते हुए आँसुओंके समान अपनी किरणोंके समूहसे शीघ्र ही पोंछता हआ यह सर्य उदय हो रहा है और उदय होते समय ऐसा जान पड़ता है मानो कमलिनियोंके वन जिन्हें आनन्द प्राप्त हो रहा है ऐसे कमलोंके द्वारा अर्घ्य लेकर उसकी १ विवृतनेत्रम् । २ अतिशयप्रात.काले। ३ अनुकरोति स्म । ४ प्रबोधन - द०, ल०। ५ योवतुमिच्छवः । ६ अनुगच्छन् । ७ के के। ८ तव । ९ -नथुवाता-द० । १० -कापाता - ल०, द० । ११ प्रतिगृहीतः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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