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________________ पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व १८१ ततान्धतमसे लोकं जनैरुन्मीलितक्षणः । नादृश्यत पुरः किंचिन् मिथ्यात्वेनैव दृषितैः ॥१७१॥ प्रसह्य तमसा रुद्वा लोकाऽन्ताकुलीभवन् । दृष्टिवैपाल्य दृष्टर्नु बहु मंने शयालुताम् ॥१७२॥ दीपिका रचिता रेजुः प्रतिवेश्म स्फुरत्विषः । घनान्धतमसो दे प्रकलुप्ता इव सूचिकाः ॥१३॥ तमो विधूय दृरेण जगदानन्दिभिः करः । उदियाय शशी लोकं शीरण क्षालयन्निव ॥१७॥ अखण्डमनुरागंण निजं मण्डलमुहहन् । सुराजेव कृतानन्दमुदगाद् विधुरुत्करः ॥१७५॥ दृष्ट्वाकृष्टहरिणं हरिं हरिणलान्छनम् । तिमिरोघः प्रदुद्राव करियूथसग महान् ॥१७६॥ तततारावली रंजे ज्योत्स्नापूरः सुधाछवेः । सबुबुद इबाकाश सिन्धोरोधः परिक्षरन् ॥१७७॥ हंसपोत इवान्विच्छन् शशी तिमिरशैवलम् । तारा सहचरीक्रान्तं विजगाहे नभःसरः ॥१७८॥ तमा निःशेषमुद्ध्य जगदाप्लावयन् करैः । प्रालेयांशुस्तदा विश्वं सुधामयमिवातनोत् ॥१७६॥ तमो दूरं विधूयाऽपि विधुरासीत् कलङ्कवान् । निसर्गजं तमो नूनं महताऽपि सुदुस्त्यजम् ॥१८०॥ थी मानो नील वस्त्र पहने हुई और चमकीले मोतियोंके आभूषण धारण किये हुई कोई अभिसारिणी स्त्री ही हो ।।१७०॥ जिस प्रकार मिथ्या दर्शनसे दूषित पुरुषोंको कुछ भी दिखाई नहीं देता - पदार्थके स्वरूपका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार गाढ़ अन्धकारसे भरे हुए लोकमें पुरुपोंको आँख खोलनेपर भी सामनेकी कुछ भी वस्तु दिखाई नहीं देती थी ॥१७१॥ जबरदस्ती अन्धकारसे घिरे हुए लोग भीतर ही भीतर व्याकुल हो रहे थे और उनकी दृष्टि भी कुछ काम नहीं देती थी इसलिए उन्होंने सोना ही अच्छा समझा था ।।१७२॥ घर-घरमें लगाये हुए प्रकाशमान दीपक ऐसे अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो अत्यन्त गाढ़ अन्धकारको भेदन करनेके लिए बहुत-सी सुइयाँ ही तैयार की गयी हों ।।१७३।। इतने ही में जगत्को आनन्दित करनेवाली किरणोंसे अन्धकारको दूरसे ही नष्ट कर चन्द्रमा इस प्रकार उदय हुआ मानो लोकको दूधसे नहला ही रहा हो ॥१७४।। वह चन्द्रमा किसी उत्तम राजाके समान संसारको आनन्दित करता हुआ उदय हुआ था, क्योंकि जिस प्रकार उत्तम राजा अनुराग अर्थात् प्रेमसे अपने अखण्ड ( सम्पूर्ण ) मण्डल अर्थात् देशको धारण करता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी अनुराग अर्थात् लालिमासे अपने अखण्डमण्डल अर्थात् प्रतिबिम्बको धारण कर रहा था और उत्तम राजा जिस प्रकार चारों ओर अपना कर अर्थात् टैक्स फैलाता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी चारों ओर अपने कर अर्थात् किरणें फैला रहा था ।।१७५॥ हरिणके चिह्नवाले चन्द्रमाको देखकर अन्धकारका समूह बड़ा होनेपर भी इस प्रकार भाग गया था जिस प्रकार कि हरिणको पकड़े हुए सिंहको देखकर हाथियोंका बड़ा भारी झुण्ड भाग जाता है ।।१७६।। जिसमें ताराओंकी पङ्क्ति फैली हुई है ऐसा चन्द्रमाकी चाँदनीका समूह उस समय ऐसा अच्छा जान पड़ता था मानो बुद्दोंसहित ऊपरसे पड़ता हुआ आकाशरूपी समुद्र का प्रवाह ही हो ॥१७७।। हंसके बच्चेके समान वह चन्द्रमा अन्धकाररूपी शैवालको खोजता हुआ तारेरूपी हंसियोंसे भरे हुए आकाशरूपी सरोवरमें अवगाहन कर रहा था - इधर-उधर घूम रहा था ।।१७८।। समस्त अन्धकारको नष्ट कर जगतको किरणोंसे भरते हए चन्द्रमाने उस समय यह समस्त संसार अमृतमय बना दिया था ॥१७९॥ अन्धकारको दूर करके भी वह चन्द्रमा कलंकी बन रहा था सो ठीक ही है क्योंकि स्वाभाविक अन्धकार बड़े पुरुषोंसे छूटना १ हठात् । २ नेत्रविफलत्वदर्शनात् । ३ शयनशीलताम् । ४ घनावतमसोद्देदे ट० । निविडान्धकारभेदने । ५ कृताः । ६ इवान्विष्टान् ल०, द०, प० । ७ विवेश ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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