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________________ १७८ आदिपुराणम् ततश्चक्रधरेणायं यदादिष्टं' प्रियोचितम् । प्रयोक्तगौरवादेव तद्ग्राह्यं साध्वसाधु वा ॥६५॥ गुरोर्वचनमादेयमविकल्प्येति या अतिः। तत्प्रामाण्यादमुष्याज्ञा संविधेया त्वयाधुना ॥६६॥ ऐक्ष्वाकः प्रथमो राज्ञां भरतो भवदग्रजः । परिक्रान्ता मही कृत्स्ना येन नामयताऽमरान् ॥६७॥ गङ्गादारं समुल्लङ्घय यो रथेनाप्रतिष्कशः । चलदाविन्द्धकल्लोल मकरोन्मकरालयम् ॥६॥ शरव्याजः प्रतापाग्निवलत्यस्य.जलेऽम्बुधे । पपौ न केवलं वाचि मानं च त्रिदिवौकसाम् ॥६९॥ मा नाम प्रणतिं यस्य ब्राजिषुर्घसदः कथम् । आकृष्टाः शरपाशेन प्राध्वंकृत्य गले बलात् ॥७॥ शरव्यमकरोद्यस्य शरपातो महाम्बुधौ । प्रसभं मगधावासं क्रान्तद्वादशयोजनः ॥७॥ विजयार्धाचले यस्य विजयो घोषितोऽमरैः । जयतो विजयादशं शरेणामोघपातिना ॥७२॥ कृतमालादयो देवा गता यस्य विधेयताम् । कृतमस्योमयश्रेणीन''भोगजयवर्णनैः ॥७३॥ गुहामुखमपध्वान्तं व्यतीत्य जयसाधनैः । उत्तरां विजयादियों व्यगाहत तां महीम् ॥७॥ मेच्छाननिच्छतोऽप्याज्ञां प्रच्छाद्य" जयसाधमैः । सेनान्या यो जयं प्राप बलादाच्छिद्य तद्धनम् ॥७५॥ वाले हैं हम लोग सदा स्वामीके अभिप्रायके अनुसार चलते हैं तथा गुण और दोषोंका विचार करने में भी असमर्थ हैं ॥६४।। इसीलिए हे आर्य, चक्रवर्तीने जो प्रिय और उचित आज्ञा दी है वह अच्छी हो या बुरी, केवल कहनेवालेके गौरवसे ही स्वीकार करने योग्य है ॥६५॥ गुरुके वचन बिना किसी तर्क-वितर्कके मान लेना चाहिए यह जो शास्त्रका वचन है उसे प्रमाण मानकर इस समय आपको चक्रवर्तीकी आजा स्वीकार कर लेनी चाहिए ॥६६॥ वह भरत इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुआ है अथवा इक्ष्वाकु अर्थात् भगवान् वृषभदेवका पुत्र है, राजाओंमें प्रथम है, आपका बड़ा भाई है और इसके सिवाय देवोंसे भी नमस्कार कराते हुए उसने समस्त पृथिवी अपने वश कर ली है ॥६७।। उसने गंगाद्वारको उल्लंघन कर अकेले ही रथपर बैठकर समुद्रको जिसकी चंचल लहरें एक दूसरेसे टकरा रही हैं ऐसा कर दिया ॥६८॥ बाणके बहानेसे इसकी प्रतापरूपी अग्नि समुद्रके जलमें भी प्रज्वलित रहती है, उस अग्निने केवल समुद्रको ही नहीं पिया है किन्तु देवोंका मान भी पी डाला है ॥६९।। भला, देव लोग उसे कैसे न नमस्कार करेंगे ? क्योंकि उसने बाणरूपी जालसे गलेमें बाँधकर उन्हें जबरदस्ती अपनी ओर खींच लिया था ॥७०॥ बारह योजन दूर तक जानेवाले उसके बाणने महासागरमें रहनेवाले मागधदेवके निवासस्थानको भी जबरदस्ती अपना निशाना बनाया था ॥७१।। व्यर्थ न जानेवाले बाणके द्वारा विजयाध पर्वतके स्वामी विजयादेवको जीतनेवाले उस भरतकी विजयघोषणा देवोंने भी की थी ॥७२॥ कृतमाल आदि देव उसकी अधीनता प्राप्त कर चुके हैं और उत्तर दक्षिण दोनों श्रेणियोंके विद्याधरोंने भी उसकी जयघोषणा की है ॥७३॥ जिसका अन्धकार दूर कर दिया गया है ऐसे गुफाके दरवाजेको अपनी विजयी सेनाके साथ उल्लंघन कर उसने विजयार्ध पर्वतकी उत्तर दिशाकी भूमिपर भी अपना अधिकार कर लिया है ॥७॥ ‘म्लेच्छ लोग यद्यपि उसकी आज्ञा नहीं मानना चाहते थे तथापि उसने सेनापतिके द्वारा अपनी १ उपदेशितम् । २ भेदमकृत्वा । ३ इक्ष्वाकोः सकाशात् संजातः । ४ असहायः । ५ परस्परताडित । अथवा कुटिल। 'आविद्धं कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रम्' इत्यभिधानात् । ६ अगुः । माङ्योगादडभावः । ७ बन्धनं छत्वा । 'प्राध्वं बन्धे' इति सूत्रेण तिसंज्ञायां 'तिदुस्वत्याक्षन्यस्त तत्पुरुष.' इति समासः, 'समासे को नत्रः प्यः' इति क्त्वाप्रत्ययस्य प्यादेशः । ८ लक्ष्यम् । ९ विनयग्राहिताम् । "विनेयो विनयग्राही' इत्यभिधानात् । १० पर्याप्तम्। ११ श्रेणीनभोगैर्जयवर्णनम् द०, इ० । श्रेणिनभोगैजयवर्णनः ल०। १२ अपगतान्धकार कृत्वा । १३ संवेष्टय । १४ बलादाकृष्य ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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