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________________ १५८ आदिपुराणम् विजितेन्द्रियवर्गाणां सुश्रुतश्रुतसंपदाम् । परलोकजिगीपूणां क्षमा साधनमुत्तमम् ॥७७॥ लेखसाध्ये च कार्येऽस्मिन् विफलोऽतिपरिश्रमः । तृणाङ्कर नखच्छेद्ये कः 'परश्वधमुद्धरेत् ॥७८॥ ततस्तितिक्षमाणेन साध्यो भ्रातृगणस्त्वया ।सोपचारं प्रयुक्तेन वचोहरगणेन सः ॥७९॥ अयैव च प्रहेतव्याः समं लेखैवंचोहराः । गवा अयुश्च तानेत चक्रिणं भजताग्रजम् ॥८॥ कल्पानोकहसेवेव तत्सेवाऽभीष्टदायिनी । गुरुकल्पोऽग्रजश्चक्री स मान्यः सर्वथापि वः ॥८१॥ विदूरस्थैर्न युष्माभिरैश्वयं तस्य राजते । तारागणैरनासन्नैरिव बिम्ब निशांपतेः ॥४२॥ साम्राज्यं नास्य तोषाय यद्भवद्भिर्विना भवेत् । सहभोग्यं हि बन्धूनामधिराज्यं सतां मुदे ॥८३॥ इदं वाचिकमन्यत्तु लेखार्थादवधार्यताम् । इति सोपायनैलेखैः प्रत्याय्यास्ते मनस्विनः ॥८॥ यशस्य मिदमेवार्य कार्य श्रेयस्यमेव च । चिन्त्यमुत्तरकार्य च साम्ना तेष्ववशेषु वै ॥४५॥ बिभ्यता जननिर्वादादनुष्टेयमिदं त्वया । स्थायुकं हि यशो लोके ''गत्वों ननु संपदः ॥८६॥ इति तद्वचनाच्चक्री वृत्तिमारमटीं जहौ। अनुवर्तनसाध्या हि महतां चित्तवृत्तयः ॥८॥ आस्तां भुजबली तावद् यत्नसाध्यो महाबलः । शेषैरव परीक्षिष्ये भ्रातृभिस्तद् द्विजिह्वताम् ॥८॥ न्द्रिय पुरुष केवल क्षमाके द्वारा ही पृथिवीको जीतते हैं ॥७६॥ जिन्होंने इन्द्रियोंके समूहको जीत लिया है, शास्त्ररूपी सम्पदाका अच्छी तरह श्रवण किया है और जो परलोकको जीतनेकी इच्छा रखते हैं ऐसे पुरुषोंके लिए सबसे उत्कृष्ट साधन क्षमा ही है ।।७७॥ जो लेख लिखकर भी किया जा सकता है ऐसे इस कार्य में अधिक परिश्रम करना व्यर्थ है क्योंकि जो तृणका अंकुर नखसे तोड़ा जा सकता है उसके लिए भला कौन कुल्हाड़ी उठाता है ॥७८। इसलिए आपको शान्त रहकर भेंटसहित भेजे हए दूतोंके द्वारा ही यह भाइयोंका समह वश करना चाहिए ॥७९॥ आज ही आपको पत्रसहित दूत भेजना चाहिए, वे जाकर उनसे कहें कि चलो और अपने बड़े भाईकी सेवा करो ॥८०॥ उनकी सेवा कल्पवृक्षकी सेवाके समान आपके सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली होगी। वह आपका बड़ा भाई पिताके तुल्य है, चक्रवर्ती है और सब तरहसे आप लोगोंके द्वारा पूज्य है ॥८१॥ जिस प्रकार दूर रहनेवाले तारागणोंसे चन्द्रमाका बिम्ब सुशोभित नहीं होता है उसी प्रकार दूर रहनेवाले आप लोगोंसे उनका ऐश्वर्य सुशोभित नहीं होता है ॥८२॥ आप लोगोंके बिना यह राज्य उनके लिए सन्तोष देनेवाल' नहीं हो सकता क्योंकि जिसका उपभोग भाइयोंके साथ-साथ किया जाता है वही साम्राज्य सज्जन पुरुषोंको आनन्द देनेवाला होता है ॥८३॥ 'यह मौखिक सन्देश है, बाकी समाचार पत्रसे मालूम कीजिए' इस प्रकार भेंटसहित पत्रोंके द्वारा उन प्रतापी भाइयोंको विश्वास दिलाना चाहिए ।।८४॥ हे आर्य, आपके लिए यही कार्य यश देनेवाला है और यही कल्याण करनेवाला है यदि वे इस तरह शान्तिसे वश न हों तो फिर आगेके कार्यका विचार करना चाहिए ॥८५॥ आपको लोकापवादसे डरते हुए यही कार्य करना चाहिए क्योंकि लोकमें यश ही स्थिर रहनेवाला है, सम्पत्तियाँ तो नष्ट हो जानेवाली हैं ॥८६॥ इस प्रकार पुरोहितके वचनोंसे चक्रवर्तीने अपनी क्रोधपूर्ण वृत्ति छोड़ दी सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंकी चित्तकी वृत्ति अनुकूल वचन कहनेसे ही ठीक हो जाती है ॥८७॥ इस समय जो प्रयत्नसे वश नहीं किया जा सकता ऐसा महाबलवान् बाहुबली दूर रहे पहले शेष भाइयोंके द्वारा ही १ परशुम् । २ सहमानेन । ३ आगच्छत । ४ पूज्यः । ५ संदेशवाक् । 'संदेशवाग वाचिकं स्याद्' इत्यभिधानात् । ६ विश्वास्याः । ७ यशस्करम् । ८ श्रेयस्करम् । ९ जनापवादात् । १० स्थिरतरम् । ११ गमनशीलाः १२ यत्र साध्या महाभुजः अ०, प०, स०, इ०, ल० । १३ बाहुबलिनः कुटिलताम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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