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________________ त्रयस्त्रिंशत्तम पर्व १३५ शाखामृगा' मृगेन्द्राणां गर्जितैरिह तर्जिताः। पुक्षीभूता निकुञ्जषु पश्य तिष्ठन्ति साध्वसात् ॥४६॥ मुनीन्द्रपाठनि?पैरितो रम्यमिदं वनम् । तृणाग्रकवलग्रासिकुरंगकुलसंकुलम् ॥४७॥ इतश्च हरिणाराति कठोरारवभीषणम् । विमुक्तकवलच्छेदप्रपलायितकुञ्जरम् ॥४८॥ जरजरन्त शृङ्गाग्रक्षतवल्मीकरोधसः । इतो रम्या वनोद्देशा वराहोत्खातपल्वला: ॥४९॥ मृगैः प्रविष्टवेशन्त वंशस्तम्बोपगै गजैः । सूच्यते हरिणाक्रान्तं वनमेतद् भयानकम् ॥५०॥ वनप्रवेशिभिनित्यं नित्यं स्थण्डिलशायिमिः । न मुच्यतेऽयमदीन्द्रो मृगैर्मुनिगणैरपि ॥५१॥ इति प्रशान्तो रौद्रश्च सदैवायं धराधरः । सन्निधानाजिनेन्द्रस्य शान्त एवाधुना पुनः ॥५२॥ . गजैः पश्य मृगेन्द्राणां संवासमिह कानने । नखरक्षतमार्गेषु स्वैरमास्पृशतामिमान् ॥५३॥ 'चारणाध्युषितानेते 'गुहोत्संगानशङ्किताः । विशन्त्यनुगताः शावैः पाकसत्त्वैः समं मृगाः ॥५४॥ अहो परममाश्चर्य तिरश्चामपि यद्गणः । अनुयातं मुनीन्द्राणामज्ञातभयसंपदाम् ॥५५॥ सोऽयमष्टापदैर्जुष्टो मृगैरन्वर्थनामभिः । पुनरष्टापदख्याति पुरति स्वदुपक्रमम् ॥५६॥ स्फुरन्मणितटोपान्तं तारकाचक्रमापतत् । न याति व्यक्तिमस्याद्रेस्तद्रोचिश्छन्नमण्डलम् ॥५७॥ . गयी है और जो मदरूपी जलसे मलिन हो रहे हैं ऐसे इस वनके वृक्ष हाथियोंकी वनक्रीड़ाको साफ-साफ सूचित कर रहे हैं ॥४५।। इधर देखिए, सिंहोंकी गर्जनासे डरे हुए ये बन्दर भयसे इकट्ठे होकर लतामण्डपोंमें बैठे हुए हैं ॥४६॥ यह वन इधर तो बड़े-बड़े मुनियोंके पाठ करनेके शब्दोंसे रमणीय हो रहा है और इधर तृणोंके अग्रभागका ग्रास खानेवाले हरिणोंके समूहसे व्याप्त हो रहा है ॥४७॥ इधर सिंहोंके कठोर शब्दोंसे भयंकर हो रहा है और इधर खाना-पीना छोड़कर हाथियोंके समूह भाग रहे हैं ॥४८॥ इधर, जिनमें वृद्ध जंगली भैंसाओंने सोंगोंकी नोकसे बामियोंके किनारे खोद दिये हैं और सूअरोंने छोटे-छोटे तालाब खोद डाले हैं ऐसे ये सुन्दर-सुन्दर वनके प्रदेश हैं ॥४९॥ छोटे-छोटे तालाबोंमें घुसे हुए हरिणों और बाँसकी झाड़ियोंके समीप छिपकर खड़े हुए हाथियोंसे साफ-साफ सूचित होता है कि इस भयंकर वनपर अभी-अभी सिंहने आक्रमण किया है ।।५०॥ सदा वनमें प्रवेश करनेवाले और सदा जमोनपर सोनेवाले हरिण और मुनियोंके समूह इस वनको कभी नहीं छोड़ते हैं ॥५१॥ इस प्रकार यह पर्वत सदा शान्त और भयंकर रहता है परन्तु इस समय श्री जिनेन्द्रदेवके सन्निधानसे शान्त ही है ॥५२॥ इधर, इस वनमें सिंहोंका हाथियोंके साथ सहवास देखिए, ये सिंह अपने नखोंसे किये हुए हाथियोंके घावोंका इच्छानुसार स्पर्श कर रहे हैं ॥५३॥ जिनके पीछेपीछे बच्चे चल रहे हैं ऐसे हरिण, सिंह, व्याघ्र आदि दुष्ट जीवोंके साथ-साथ चारण-मुनियोंसे अधिष्ठित गुफाओंमें निर्भय होकर प्रवेश करते हैं ॥५४॥ अहा, बड़ा आश्चर्य है कि पशुओंके समूह भी, जिन्हें वनके भय और शोभाका कुछ भी पता नहीं है ऐसे मुनियोंके पीछे-पीछे फिर रहे हैं ।।५५।। सार्थक नामको धारण करनेवाले अष्टापद नामके जीवोंसे सेवित हुआ यह पर्वत आपके चढ़नेके बाद अष्टापद नामको प्राप्त होगा ॥५६॥ जिसपर अनेक मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे इस पर्वतके किनारेके समीप आता हुआ नक्षत्रोंका समूह उन मणियोंकी किरणोंसे अपना मण्डल तिरोहित हो जानेसे प्रकटताको प्राप्त नहीं हो रहा है। भावार्थ - १ मर्कटाः । २ सिंह । ३ वृद्धमहिष । ४ वामलूरतटाः । 'वामलूरश्च नाकुश्च वल्मीकं पुन्नपुंसकम्' इत्यभिधानात् । ५ अल्पसरोवराः । ६ पल्वलः । 'वेशन्तं पल्वलं चाल्पसर' इत्यभिधानात् । ७ वेणुपुञ्जसमीपगैः । ८ सहवासम् । ९ नखरक्षतकोर्णपंक्तिषु । १० चारणमुनिभिराश्रितान् । ११ गुहामध्यान् । १२ सिंहशार्दूलादिक्रूरमृगैः । १३ हरिणादयः । १४ अनुगतम् । १५ सेवितः । १६ सार्थाऽभिधानः । १७ भविष्यत्काले आगमिष्यति । १८ त्वया प्रथमोपक्रमं यथा भवति तथा । १९ आगच्छत् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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