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________________ १३४ आदिपुराणम् किंचिदन्तरमारुह्य पश्यन्नद्रेः परां श्रियम् । प्राप्तावसरमित्यूचे वचनं च पुरोधसा ॥३६॥ पश्य देव गिररस्य प्रदेशान्बहुविस्मयान् । रमन्ते त्रिदशा यत्र स्वर्गावासेऽप्यनादराः ॥३७॥ पर्याप्तमतदवास्य प्राभवं भुवनातिगम् । देवो यदेनमध्यास्त चराचरगुरुः पुरुः ॥३८॥ महाद्विरयमुत्संगसंगिनीः सरिदङ्गनाः । शश्वद् बिभर्ति कामीव गलन्नीलजलांशुकाः ॥३६॥ क्रीडाहतोरहिंस्रोऽपि' मृगेन्द्रो गिरिकन्दरात् । महाहिमयमाकर्षन्दन्मुिञ्चत्यपारयन् ॥४०॥ सर्वद्वन्द्व सहान्सार्वान् जनतातापहारिणः । मुनीनिव वनाभोगानेष धत्तेऽधिमेखलम् ॥४१॥ हरीन्नखरनिर्मिन्नमदद्विरदमस्तकान् । निर्झरैः पापमीत्येव तर्जयत्येष सारवैः ॥४२॥ धत्ते सानुचरान् भद्रान् उच्चैशान स्ववग्रहान् । वनद्विपानयं शैलो भवानिव महीभुजः ॥४३॥ ध्वनतो घनसंघातान्' शरमा रभसादमी। द्विरदाशङ्कयोत्पत्य पतन्तो यान्ति शोच्यताम् ॥४४॥ कपोलकाषसंरुग्णत्वचो मदजलाविला: । द्विपानां वनसंभोगं सूचयन्तीह शाखिनः ॥४॥ समझकर नखरूपी अंकुरोंसे विदारण करता हुआ सिंह देखा ॥३५॥ भरत महाराज कुछ दूर आगे चढ़कर जब पर्वतकी शोभा देखने लगे तब पुरोहितने अवसर पाकर नीचे लिखे अनुसार वचन कहे ॥३६॥ हे देव, इस पर्वतके अनेक आश्चर्योसे भरे हुए उन प्रदेशोंको देखिए जिनपर कि देव लोग भी स्वर्गवास में अनादर करते हुए क्रीड़ा कर रहे हैं ॥३७।। समस्त लोकको उल्लंघन करनेवाली इस पर्वतकी महिमा इतनी ही बहुत है कि चर और अचर-सभीके गुरु भगवान् वृषभदेव इसपर विराजमान हैं ॥३८॥ यह महापर्वत अपनी गोदी अर्थात् नीचले मध्यभागमें रहनेवाली और जिनके नीले जलरूपी वस्त्र छूट रहे हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियोंको कामी पुरुषकी तरह सदा धारण करता है ।।३९।। यह सिंह अहिंसक होनेपर भी केवल क्रीड़ाके लिए पर्वतकी गुफामें-से एक बड़े भारी सर्पको खींच रहा है परन्तु लम्बा होनेसे खींचनेके लिए असमर्थ होता हुआ उसे छोड़ भी रहा है ॥४०॥ यह पर्वत अपने तटभागपर ऐसे अनेक वनके प्रदेशोंको धारण करता है जो कि ठीक मुनियोंके समान जान पड़ते हैं क्योंकि जिस प्रकार मुनि सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् शीत उष्ण आदिकी बाधा सहन करते हैं उसी प्रकार वे वनके प्रदेश भी सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् पशुपक्षियों आदिके युगल सहन करते हैं,-धारण करते हैं, जिस प्रकार मुनि सबका कल्याण करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी सबका कल्याण करते हैं और जिस प्रकार मुनि जनसमूहके सन्ताप अर्थात् मानसिक व्यथाको दूर करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी संताप अर्थात् सूर्यके घामसे उत्पन्न हुई गरमीको दूर करते हैं ॥४१॥ यह पर्वत शब्द करते हुए झरनोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो जिन्होंने अपने नखोंसे मदोन्मत्त हाथियोंके मस्तक विदारण किये हैं ऐसे सिंहोंको पापके डरसे तर्जना ही कर रहा हो-डाट ही दिखा रहा हो ॥४२॥ हे नाथ, जिस प्रकार आप सानुचर अर्थात् सेवकोंसहित, भद्र, उच्च कुलमें उत्पन्न हुए और उत्तम शरीरवाले अनेक राजाओंको धारण करते हैं-उन्हें अपने अधीन रखते हैं, उसी प्रकार यह पर्वत भी सानुचर अर्थात् शिखरोंपर चलनेवाले, पीठपर-की उच्च रीढ़से युक्त और उत्तम शरीरवाले भद्र जातिके जंगली हाथियोंको धारण करता है ॥४३॥ इधर ये अष्टापद, गरजते हुए मेघोंके समूहको हाथी समझकर उनपर उछलते हैं परन्तु फिर नीचे गिरकर शोचनीय दशाको प्राप्त हो रहे हैं ॥४४॥ कपोलोंके घिसनेसे जिनकी छाल घिस १ अघातुकोऽपि । २ समर्थो भूत्वा । ३ प्राणियुगल, पक्षे दुःख । ४ सर्वहितान् । ५ गिरिः । ६ ध्वनिसहितः । ७ सानुपु चरन्तीति सानुचरास्तान, पक्षे अनुचरैः सहितान् । ८ उन्नतपृष्ठास्थीन्, पक्षे इक्ष्वाक्वादिवंशान् । ९ स्वविग्रहान् ट०। शोभनललाटान् । 'अवग्रहो ललाटं स्याद्' इत्यभिधानात् । पक्षे-सुष्ठु स्वतन्त्रतानिषेधान् । 'अवग्रह इति ख्यातो वृष्टिरोधे गजालिके। स्वतन्त्रतानिषेधेऽपि प्रतिबन्धेऽप्यवग्रहः' इत्यभिधानात् । १० भूपतीन् । ११ मेघसमहान् । १२ गण्डस्थलनिघर्षणसंभग्न । १३ आर्द्राः । १४ गिरौ ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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