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________________ द्वात्रिंशत्तमं पर्व १२५ अधिमंखलमस्यासीच्छिलाभित्तिषु चक्रिणः । स्वनामाक्षरविन्यासे धृति विश्वक्षमाजितः ॥१४०॥ काकिणीरत्नमादाय यदा लिलिखिषत्ययम् । तदा राजसहस्राणां नामान्यत्रैमताधिराट् ॥१४१॥ असंख्य कल्पकोटीषु येऽतिक्रान्ता धराभुजः । तेषां नामभिराकीणं तं पश्यन् स सिसिष्मये ॥१४२॥ ततः किंचित् स्खलद्गो विलक्षीभूय चक्रिराट । अनन्यशासनामेनां न मने भरतावनीम् ॥१४३॥ स्वयं कस्यचिदेकस्य निरस्यन्नामशासनम् । स मने निखिलं लोकं प्रायः स्वार्थपरायणम् ॥१४४॥ अथ तत्र शिलापट्टे स्वहस्ततलनिस्तले । प्रशस्तिमित्युदात्तार्थं व्यलिखत् स यशोधनः ॥१४५॥ स्वस्तीक्ष्वाकुकुलव्योमतलप्रालेयदीधितिः । चातुरन्त महीभर्ता भरतः शातमातुरः ॥१४६॥ श्रीमानानम्रनिःशेषखचरामरभूचरः । प्राजापत्यो मनुर्मान्यः शूरः शुचिरुदारधीः ॥१४७॥ चरमागधरो धीरो "धौरेयश्चक्रधारिणाम् । परिक्रान्तं धराचक्र जिष्णुना येन दिग्जये ॥१४८॥ यस्याष्टादशकोटथोऽश्वा जलस्थलविलङ्घिनः । लक्षाश्चतुरशीतिश्च मदेभा जयसाधने ॥१४९॥ यस्य दिग्विजये विष्वग्बलरेणुभिरुत्थितैः । सदिङ्मखं खमारुद्धं कपोतगलकर्बु रैः ॥१५०॥ निर्मल और विजयलक्ष्मीके मुख देखनेके लिए मंगलमय दर्पणके समान उस वृषभाचलके किनारेकी दीवारें भरतका मन हरण कर रही थीं ॥ १३९ ॥ समस्त पृथिवीको जीतनेवाले चक्रवर्ती भरतको उस पर्वतके किनारेकी शिलाकी दीवारोंपर अपने नामके अक्षर लिखनेमें बहुत कुछ सन्तोष हुआ था ॥ १४० ॥ चक्रवर्ती भरतने काकिणी रत्न लेकर ज्यों ही वहाँ कुछ लिखनेकी इच्छा की त्यों ही उन्होंने वहाँ लिखे हुए हजारों चक्रवर्ती राजाओंके नाम देखे ॥१४१॥ असंख्यात करोड़ कल्पोंमें जो चक्रवर्ती हए थे उन सबके नामोंसे भरे हुए उस वृषभाचलको देखकर भरतको बहुत ही विस्मय हुआ ॥ १४२ ।। तदनन्तर जिसका कुछ अभिमान दूर हआ है ऐसे चक्रवर्तीने आश्चर्यचकित होकर इस भरतक्षेत्रकी पथिवीको अनन्यशासन अर्थात् जिसपर दूसरेका शासन न चलता हो ऐसा नहीं माना था। भावार्थ - वषभाचलकी दीवालोंपर असंख्यात चक्रवतियोंके नाम लिखे हुए देखकर भरतका सब अभिमान नष्ट हो गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीपर मेरे समान अनेक शक्तिशाली राजा हो गये हैं ॥ १४३ ॥ चक्रवर्ती भरतने किसी एक चक्रवर्तीके नामकी प्रशस्तिको स्वयं – अपने हाथसे मिटाया और वैसा करते हुए उन्होंने प्रायः समस्त संसारको स्वार्थपरायण समझा ।। १४४ ।। अथानन्तर - यश ही जिसका धन है ऐसे चक्रवर्तीने अपने हाथके तलभागके समान चिकने उस शिलापट्टपर नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट अर्थसे भरी हुई प्रशस्ति लिखी ॥ १४५ ॥ स्वस्ति श्री इक्ष्वाकु वंशरूपी आकाशका चन्द्रमा और चारों दिशाओंकी पृथिवीका स्वामी मैं भरत हूँ, मैं अपनी माताके सौ पुत्रोंमें-से एक बड़ा पुत्र हूँ, श्रीमान् हूँ, मैंने समस्त विद्याधर देव और भूमिगोचरी राजाओंको नम्रीभूत किया है, प्रजापति भगवान् वृषभदेवका पुत्र हूँ, मनु हूँ, मान्य हूँ, शूरवीर हूँ, पवित्र हूँ, उत्कृष्ट बुद्धिका धारक हूँ, चरमशरीरी हूँ, धीर वीर हूँ, चक्रवतियोंमें प्रथम हूँ और इसके सिवाय जिस विजयीने दिग्विजयके समय समस्त पृथिवीमण्डलकी परिक्रमा दी है अर्थात् समस्त पृथिवीमण्डलपर आक्रमण किया है, जिसके जल और स्थलमें चलनेवाले अठारह करोड़ घोड़े हैं, जिसकी विजयी सेनामें चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी १ संतोषः । २ सकलमहीविजयिनः । ३ लिखितुमिच्छति । ४ अपरिमितानां राज्ञामित्यर्थः । ५ विस्मयान्वितो भूत्वा । 'विलक्षो विस्मयान्विते' इत्यभिधानात् । ६ वर्तुले समतले इत्यर्थः । ७ चतुरन्तो द०, ५०, इ०, अ०, स०। ८ त्रिसमुद्र-हिमवगिरिपर्यन्तमहीनाथः । ९ शतस्य माता शतमाता तस्या अपत्यं शातमातुरः । १० प्रजापतेः पुरोरपत्यं पुमान् । ११ मुख्यः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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