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________________ आदिपुराणम् 10 इत्यस्याद्रेः परं शोभां शंसत्युच्चैः पुरोधसि । प्रशशंस तमन्द्रं संप्रीतो भरताधिपः ॥ १२६ ॥ स्वभुक्तिक्षेत्रसीमानं सोऽभिनन्द्य हिमाचलम् । प्रत्यावृतत् प्रभुद्धं वृषभाद्विं कुतूहलात् ॥१३०॥ यो योजनशतोच्छ्रायो मूले तावच्च विस्तृतः । तदर्द्धविस्तृतिमूर्ध्नि भुवो मौलि रिवोद्गतः ॥ १३१ ॥ यस्योरसंगभुवो रम्याः कदली घण्डमण्डितैः । संभोगाय नभोगानां वसन्ते स्म लतालयैः ॥ १३२॥ समागम सनागैश्च सपुन्नागैः परिष्कृतम् । यदुपान्ते वनं सेव्यं मुच्यते जातु नामरैः ॥ १३३ ॥ स्त्रतटस्फटिकोत्सर्पत्प्रभादिग्धहरिन्मुखम् । शरदभ्रैरिवारब्धवपुषं सनभोजुषम् ॥१३४॥ तं शैलं भुवनस्यैकं ललामेव निरूपयन् । कलयामास लक्ष्मीवान् स्वयशः प्रतिमानकम् ॥१३५॥ तमेकपाण्डुरं " शैलमाक्यान्तमनश्वरम् । स्वयशोराशिनीकाशं पश्यन्नभिननन्द सः ॥ १३६ ॥ asar: प्रभुमायान्तमायान्तमखिलद्विषाम् । प्रत्यग्रही दिवाभ्येत्य " विष्वद्व्यग्भिर्वनानिलैः ॥१३७॥ तत्तटोपान्तविश्रान्तखचरोरग किन्नरैः । प्रोद्गीयमानममलं शुश्रुवे "स्वयंशोऽमुना ॥ १३८ ॥ 'जयलक्ष्मी मुखालोकमङ्गलादर्शविभ्रमाः । तत्तटीभित्तयो जहुर्मनोऽस्य स्फटिकामलाः ॥ १३९॥ १६ १२४ ४ है, अथवा इस पर्वत अपने विस्तारसे लोकका बहुत कुछ अंश व्याप्त कर लिया है ।। १२८ ॥ इस प्रकार जब पुरोहित उस पर्वतकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन कर चुका तब भरतेश्वरने भी प्रसन्न होकर उस पर्वतकी प्रशंसा की ।। १२९ || अपने उपभोग करनेयोग्य क्षेत्रकी सीमा स्वरूप हिमवान् पर्वतकी प्रशंसा कर महाराज भरत कुतूहलवश वृषभाचलको देखने के लिए लौटे ॥१३०॥ जो सौ योजन ऊँचा है, मूल तथा ऊपर क्रमसे सौ और पचास योजन चौड़ा है एवं ऊपरकी ओर उठा हुआ होनेसे पृथिवीके मस्तक के समान जान पड़ता है । जिसके ऊपरके मनोहर प्रदेश केलोंके समूह से सुशोभित लतागृहोंसे आकाशगामी देव तथा विद्याधरोंके उपभोग करने योग्य हैं, नाग, सहजना और नागकेशरके वृक्षोंसे घिरे हुए तथा सेवन करने योग्य जिस पर्वतके समीपके वनों को देव लोग कभी नहीं छोड़ते हैं। अपने तटपर लगे हुए स्फटिक मणियोंकी फैलती हुई प्रभासे जिसने समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली हैं, जिसका शरीर शरद ऋतु के बादलों से बना हुआ-सा जान पड़ता है और जो सदा देव तथा विद्याधरोंसे सहित रहता है, ऐसे उस पर्वतको लोकके एक आभूषणके समान देखते हुए श्रीमान् भरतने अपने यशका प्रतिबिम्ब माना था ।। १३१ - १३५ ।। जो एक सफेद रंगका है और जो कल्पान्त काल तक कभी नष्ट नहीं होता ऐसे उस वृषभाचलको अपने यशकी राशिके समान देखते हुए महाराज भरत बहुत ही आनन्दित हुए थे ।।१३६।। उस समय वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त शत्रुओंकी सर्वमुखी भाग्यको नष्ट करनेवाले चक्रवर्ती भरतको अपने समीप आता हुआ जानकर चारों ओर बहनेवाले वनके वायुके द्वारा सामने जाकर उनका स्वागत-सत्कार ही कर रहा हो ।। १३७ ।। वहाँपर भरतने उस पर्वतके किनारेके समीप विश्राम करते हुए विद्याधर नागकुमार और किन्नर देवोंके द्वारा गाया हुआ अपना निर्मल यश भी सुना था ॥ १३८ ॥ स्फटिकके समान १२ १ स्तुति कुर्वति सति । २ प्रशंस्य । ३ व्याघुटितवान् । ४ खण्ड-अ० ६ नागवृक्षसहितम् । ७ सर्जकतरुभिः । ८ यदुपान्तवनं ल०, प०, ५०, १० घटित । ११ आकाशस्पर्शनसहितम्, देव- विद्याधर- सहितम् । १४ सदृशम् । १५ केवलं धवलम् । १६ समानम् । १७ आ समन्तात् अयः इत्यर्थः । विभूत्यन्तकम् समन्तात्पुण्यनाशक मित्यर्थः । 'अतः शुभावहो विधि' प्रसारिभिः । विष्वट्यङ् विष्वगञ्चतीत्यभिधानात् । १९ श्रूयते स्म । द०, स० ल० । ५ समर्था भवन्ति । अ०, प०, स० । ९ लिप्तदिङ्मुखम् । तिलकम् । १३ विलोकयन् । आयः तस्य अन्तः अन्तकः नाश रित्यभिधानात् । १८ समन्तात्
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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