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________________ आदिपुराणम् 'कविं पुराणमाश्रित्य प्रसृतत्वात् पुराणता । महत्त्वं स्वमहिम्नैव तस्येत्यन्यैर्निरुच्यते ॥२२॥ महापुरुषसंबन्धि महाभ्युदयशासनम् । महापुराणमान्नातमत एतन्महर्षिभिः ॥२३॥ ऋषिप्रणीतमाषं स्यात् सूक्तं सूनृतशासनात् । धर्मानुशासनाच्चेदं धर्मशास्त्रमिति स्मृतम् ॥२४॥ इतिहास इतीष्टं तद् इति हासीदिति श्रुतेः । इतिवृत्तमथैतिर्षमाम्नायं चामनन्ति तत् ॥२५॥ पुराणमितिहासाख्यं यत्प्रोवाच गणाधिपः । तत्किलाहमधीवक्ष्ये केवलं भक्तिचोदितः ॥२६॥ पुराणं गणभृत्प्रोक्तं "विवक्षोमें महान्भरः । "विवक्षोरिव दम्यस्य पुङ्गारमुद्धृतम् ॥२७॥ क गम्भीरः पुराणाब्धिः क माइग्बोधदुर्विधः । सोऽहं महोदधिं दोभ्यां तितीर्युर्यामि हास्यताम् ॥२८॥ अथवास्त्वेतदल्पोऽपि यद्घटेऽहं स्वशक्तितः । लनबालधिरप्युक्षा किं नोत्पुच्छयते तराम् ॥२९॥ गणाधीशैः प्रणीतेऽपि पुराणेऽस्मिन्नहं यते"। सिंहैरासेविते मागें मृगोऽन्यः केन वार्यते ॥३०॥ पुराणकविमिः क्षुण्णे कथामार्गेऽस्ति मे गतिः। पौरस्त्यैः शोधितं मार्ग को वा नानुव्रजेज्जनः ॥३१॥ है। इसमें महापुरुषोंका वर्णन किया गया है अथवा तीर्थकर आदि महापुरुषोंने इसका उपदेश दिया है अथवा इसके पढ़नेसे महान कल्याणकी प्राप्ति होती है इसलिए इसे महापुराण कहते हैं ।।२।'प्राचीन कवियोंके आश्रयसे इसका प्रसार हुआ है इसलिए इसकी पुराणता-प्राचीनता प्रसिद्ध ही है तथा इसकी महत्ता इसके माहात्म्यसे ही प्रसिद्ध है इसलिए इसे महापुराण कहते हैं' ऐसा भी कितने ही विद्वान् महापुराणकी निरुक्ति-अर्थ करते हैं ।।२२।। यह पुराण महापुरुषोंसे सम्बन्ध रखनेवाला है तथा महान अभ्युदय-स्वर्ग मोक्षादि कल्याणोंका कारण है इसलिए महर्षि लोग इसे महापुराण मानते हैं ।।२३।। यह ग्रन्थ ऋषिप्रणीत होनेके कारण आर्ष, सत्यार्थका निरूपक होनेसे सूक्त तथा धर्मका प्ररूपक होनेके कारण धर्मशास्त्र माना जाता है। 'इति इह आसीत् यहाँ ऐसा हुआ-ऐसी अनेक कथाओंका इसमें निरूपण होनेसे ऋषि गण इसे 'इतिहास', 'इतिवृत्त' और 'ऐतिह्य' भी मानते हैं ॥२४-२५।। जिस इतिहास नामक महापुराणका कथन स्वयं गणधरदेवने किया है उसे मैं मात्र भक्तिसे प्रेरित होकर कहूँगा क्योंकि मैं अल्पज्ञानी हूँ ॥२६॥ बड़े-बड़े बैलों-द्वारा उठाने योग्य भारको उठानेकी इच्छा करनेवाले बछड़ेको जैसे बड़ी कठिनता पड़ती है वैसे ही गणधरदेवके द्वारा कहे हुए महापुराणको कहनेकी इच्छा रखनेवाले मुझ अल्पज्ञको पड़ रही है ॥२७॥ कहाँ तो यह अत्यन्त गम्भीर पुराणरूपी समुद्र और कहाँ मुझ जैसा अल्पज्ञ! मैं अपनी भुजाओंसे यहाँ समुद्रको तैरना चाहता हूँ इसलिए अवश्य ही हँसीको प्राप्त होऊँगा ।।२८॥ अथवा ऐसा समझिए कि मैं अल्पज्ञानी होकर भी अपनी शक्तिके अनुसार इस पुराणको कहनेके लिए प्रयत्न कर रहा हूँ जैसे कि कटी पूँछवाला भी बैल क्या अपनी कटी पूँछको नहीं उठाता ? अर्थात् अवश्य उठाता है ।।२९।। यद्यपि यह पुराण गणधरदेवके द्वारा कहा गया है तथापि मैं भी यथाशक्ति इसके कहनेका प्रयत्न करता हूँ। जिस रास्तेसे सिंह चले हैं उस रास्तेसे हिरण भी अपनी शक्त्यनुसार यदि गमन करना चाहता है तो उसे कौन रोक सकता है ? ॥३०॥ प्राचीन कवियों-द्वारा क्षुण्ण किये गये-निरूपण कर सुगम बनाये गये कथामार्गमें मेरी भी गति १. पुराणं कवि-द० । पूर्वकविम् । २. पुराणस्य । ३. निरूप्यते अ०, स०, द० । ४. कथितम् । ५. उक्तम् । ६. इतिहासमिती-म०, ल०। ७. 'पारम्पर्योपदेशे स्यादैतिह्ममिति हाव्ययम्' इति वचनात्, अथवा इतिवृत्तम् ऐतिह्यम् आम्नायश्चेति नामत्रयम् । ८. -मृषयो वामनन्ति स०, ल०। ९. कथयन्ति । १०. नोदितः द०, अ०। ११. वक्तुमिच्छोः । १२. वोढुमिच्छोः । १३. बालवत्सस्य । १४. दरिद्रः । १५. प्रयत्नं करोमि । १६. यान् अ०, ५०, स०, ल०, म०। १७. संमर्दिते । १८. उपायः । १९. पुरोगमः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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