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________________ प्रथमं पर्व चिरं तपस्यतो यस्य जटा मूर्ध्नि बभुस्तराम् । ध्यानाग्निदग्धक न्धनिर्यद्धृमशिखा इव ॥९॥ मर्यादाविष्क्रियाहेतोर्विहरन्तं यदृच्छया। चलन्तमिव हेमाद्रिं ददृशुर्य सुरासुराः ॥१०॥ श्रेयसि प्रयते दानं यस्मै दत्त्वा प्रसेदुषि । पञ्चरत्नमयीं वृष्टिं ववृषुः सुरवारिदाः ॥११॥ "उदपादि विभोर्यस्य घातिकर्मारिनिर्जयात् । केवलाख्यं परं ज्योतिर्लोकालोकावभासकम् ॥१२॥ येनाभ्यधायि सद्धर्मः कर्मारातिनिवर्हणः । सदःसरोमुखाम्भोजवनदीधितिमालिना ॥१३॥ यस्मात् स्वान्वयमाहात्म्यं शुश्रुवान् भरतात्मजः । सलीलमनटच्चारूंचञ्चच्चीवरवल्कलः ॥१४॥ तमादिदेवं नाभेयं वृषमं वृषभध्वजम् । प्रणौमि 'प्रणिपत्याहं "प्रणिधाय मुहुर्मुहुः ॥१५॥ अजितादीन् महावीरपर्यन्तान् परमेश्वरान् । जिनेन्द्रान्' पर्युपासेऽहं धर्मसाम्राज्यनायकान् ॥१६॥ सकलज्ञानसाम्राज्ययौवराज्यपदे स्थितान् । "तोष्टवीमि गणाधीशानाप्तसंज्ञानकण्ठिकान् ॥१७॥ अनादिनिधनं तुङ्गमनल्पफलदायिनम् । "उपाध्वं विपुलच्छाय" श्रुतस्कन्धमहाद्रुमम् ॥१८॥ इत्याप्राप्तवचः स्तोत्रैः कृतमङ्गलसस्क्रियः । पुराणं संग्रहीष्यामि त्रिषष्टिपुरुषाश्रितम् ॥१९॥ तीर्थेशामपि चक्रेश हलिनामर्धचक्रिणाम् । त्रिषष्टिलक्षणं वक्ष्ये पुराणं तद्विषामपि ॥२०॥ पुरातनं पुराणं स्यात् तन्महन्महदाश्रयात् । महद्भिरुपदिष्टत्वात् महाश्रेयोऽनुशासनात् ॥२१॥ रूपी अग्निसे जलाये गये कर्मरूप इंधनसे निकलती हुई धूमकी शिखाओंके समान शोभायमान होती थीं, मर्यादा प्रकट करनेके अभिप्रायसे स्वेच्छापूर्वक चलते हुए जिन भगवान्को देखकर सर और असर ऐसा समझते थे मानो सुवर्णमय मेरु पर्वत ही चल रहा जिन भगवान्को हस्तिनापुरके राजा श्रेयांसके दान देनेपर देवरूप मेघोंने पाँच प्रकारके रत्नोंकी वर्षा की थी, कुछ समय बाद घातियाकर्मरूपी शत्रुओंको पराजित कर देनेपर जिन्हें लोकालोकको प्रकाशित करनेवाली केवलज्ञानरूपी उत्कृष्ट ज्योति प्राप्त हुई थी, जो सभारूपी सरोवरमें बैठे हुए भव्य जीवोंके मुखरूपी कमलोंको प्रकाशित करनेके लिए सूर्यके समान थे, जिन्होंने कर्मरूपी शत्रुओंको नष्ट करनेवाले समीचीन धर्मका उपदेश दिया था, और जिनसे अपने वंशका माहात्म्य सुनकर वल्कलोंको पहिने हुए भरतपुत्र मरीचिने लीलापूर्वक नृत्य किया था। ऐसे उन नाभिराजाके पुत्र वृषभचिह्नसे सहित आदिदेव (प्रथम तीर्थंकर ) भगवान् वृषभदेवको मैं नमस्कार कर एकाग्र चित्तसे बार-बार उनकी स्तुति करता हूँ॥५-१५।। इनके पश्चात् , जो धर्मसाम्राज्यके अधिपति हैं ऐसे अजितनाथको आदि लेकर महावीर पर्यन्त तेईस तीर्थंकरोंको भी नमस्कार करता हूँ।१६।। इसके बाद, केवलज्ञानरूपी साम्राज्यके युवराज पदमें स्थित रहनेवाले तथा सम्यग्ज्ञानरूपी कण्ठाभरणको प्राप्त हुए गणधरोंकी मैं बार-बार स्तुति करता हूँ ॥१७।। हे भव्य पुरुषो! जो द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा आदि और अन्तसे रहित है, उन्नत है, अनेक फलोंका देनेवाला है, और विस्तृत तथा सघन छायासे युक्त है ऐसे श्रुतस्कन्धरूपी वृक्षकी उपासना करो ॥१८॥ इस प्रकार देव गुरु शास्त्रके स्तवनों-द्वारा मङ्गलरूप सक्रियाको करके मैं वेसठ शलाका (चौबीस तीर्थकर, बारह चक्रवर्ती, नव नारायण, नव प्रतिनारायण और नव बलभद्र) पुरुषोंसे आश्रित पुराणका संग्रह करूँगा ॥१९॥ तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों, बलभद्रों, नारायणों और उनके शत्रुओं-प्रतिनारायणोंका भी पुराण कहूँगा ।।२०।। यह ग्रन्थ अत्यन्त प्राचीन कालसे प्रचलित है इसलिए पुराण कहलाता १. कर्कंध-द० । एध इन्धनम् । २. प्रकटता । ३. पवित्रे । ४. प्रसन्ने सति। ५. उत्पन्नम् । पदः 'पदः कर्तरि लङि तेङिनित्यं भवति जिः ।' ६. मरीचिः। ७. कन्यारूपवल्कलः। ८.-वल्कलम् अ०। ९. 'णु स्तुतौ'। १०. प्रह्वो भूत्वा । ११. ध्यात्वा । १२. आराधये । १३. भृशं पुनः पुनः स्तोमि । १४. आराधयध्वम् ।। १५. पक्षे विपुलदयम् । १६. परापरगुरु-तद्वचनम् । १७. संक्षेपं करिष्ये ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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