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________________ प्रथमं पर्व महाकरीन्द्रसंमर्दविरलीकृतपाइपे । वने वन्येमकलमाः सुलभाः स्वैरचारिणः ॥३२॥ महातिमिपृथुप्रोथपर्थी कृतजलेऽर्णवे । यथेष्टं पर्यटन्स्येव ननु पाठीनशावकाः ॥३३॥ महामटास्त्रसंपातनिरुद्ध प्रतियोके । भटब्रुवोऽपि निश्श वल्गस्येव रणाङ्गणे ॥३४॥ तत्पुराणकवीनेव मत्वा हस्तावलम्बनम् । महतोऽस्य पुराणाब्धेस्तरणायोचतोऽस्म्यहम् ॥३५॥ महत्यस्मिन् पुराणाब्धौ शाखाशततरङ्गके । स्खलितं यत्प्रमादान्मे तद् बुधाः क्षन्तुमर्हथ ॥३६॥ कविप्रमादजान् दोषानपास्यास्मात् कथामृतात् । सन्तो गुणान् जिघुमन्तु गुणगृह्यो हि सज्जनः॥३७॥ सुभाषितमहारत्नसंभृतेऽस्मिन् कथाम्बुधौ । "दोषनाहाननादृत्य यतध्वं सारसंग्रहे ॥३८॥ कवयः सिद्धसेनाया वयं च कवयो मताः । मणयः पनरागाथा ननु काचोऽपि मेचकः॥३९॥ यद्वचोदर्पणे कृत्स्नं 'वाङ्मयं प्रतिविम्बितम् । तान् कवीन् बहुमन्येऽहं किमन्यैः कविमानिमिः ॥४०॥ नमः पुराणकारेभ्यो यद्वक्त्राब्जे सरस्वती । येषामद्धा कवित्वस्य "सूत्रपातायितं वचः ॥४५॥ है क्योंकि आगे चलनेवाले पुरुषोंके द्वारा जो मार्ग साफ कर दिया जाता है फिर उस मार्गमें कौन पुरुष सरलतापूर्वक नहीं जा सकता है ? अर्थात् सभी जा सकते हैं ॥३१॥ अथवा बड़े-बड़े हाथियोंके मर्दन करनेसे जहाँ वृक्ष बहुत ही विरले कर दिये गये हैं ऐसे वनमें जंगली हस्तियों के बच्चे सुलभतासे जहाँ-तहाँ घूमते ही हैं ॥३२॥ अथवा जिस समुद्र में बड़े-बड़े मच्छोंने अपने विशाल मुखों के आंघातसे मार्ग साफ कर दिया है उसमें उन मच्छोंके छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी इच्छासे घूमते हैं ॥३३॥ अथवा जिस रणभूमिमें बड़ेबड़े शूर-वीर योद्धाओंने अपने शस्त्र-प्रहारोंसे शत्रुओंको रोक दिया है उसमें कायर पुरुष भी अपनेको योद्धा मानकर निःशक हो उछलता है ।।३४।। इसलिए मैं प्राचीन कवियाँको ही हाथका सहारा मानकर इस पुराणरूपी समुद्रको तैरनेके लिए तत्पर हुआ हूँ ॥३५।। सैकड़ों शाखारूप तरङ्गोंसे व्याप्त इस पुराणरूपी महासमुद्रमें यदि मैं कदाचित् प्रमादसे स्खलित हो जाऊँ-अज्ञानसे कोई भूल कर बैलूं तो विद्वज्जन मुझे क्षमा ही करेंगे ॥३६॥ सज्जन पुरुष कविके प्रमादसे उत्पन्न हुए दोषोंको छोड़कर इस कथारूपी अमृतसे मात्र गुणोंके ही ग्रहण करनेकी इच्छा करें क्योंकि सजन पुरुष गुण ही ग्रहण करते हैं। ॥३७॥ उत्तम-उत्तम उपदेशरूपी रत्नासे भरे हुए इस कथारूप समुद्र में मगरमच्छोंको छोड़कर सार वस्तुओंके ग्रहण करने में ही प्रयत्न करना चाहिए ॥३८॥ पूर्वकालमें सिद्धसेन आदि अनेक कवि हो गये हैं और मैं भी कवि हूँ सो दोनोंमें कवि नामकी तो समानता है परन्तु अर्थमें उतना ही अन्तर है जितना कि पद्मराग मणि और काचमें होता है ॥३९॥ इसलिए जिनके वचनरूपी दर्पणमें समस्त शास्त्र प्रतिबिम्बित थे मैं उन कवियोंको बहुत मानता हूँ-उनका आदर करता हूँ। मुझे उन अन्य कवियोंसे क्या प्रयोजन है जोव्यर्थ ही अपनेको कवि माने हुए हैं॥४०॥ मैं उन पुराणके रचनेवाले कवियोंको नमस्कार करता हूँ जिनके मखकमलमें सरस्वती साक्षात् निवास करती है. तथा जिनके वचन अन्य कवियोंकी कवितामें सूत्रपातका कार्य करते १. नासिका। २. अपन्याः पन्थाः कृतं पथीकृतं जलं यत्र । ३. जलार्णवे म०, अ०,१०, ल० । ४. भटे । ५. भटजातिमात्रोपजीवी, तुच्छंभट इत्यर्थः । ६. तत् कारणात् । सत्पु०-अ०, स०, द० । ७. अवान्तरकथा । ८. गृहीतुमिच्छन्तु । ९. गुणगृह्या हि सज्जनाः १०, म०, ल०। गुणा एवं गृह्या यस्यासो। १०. दोषग्रहान ल०।११. तांगमव्याकरणछन्दोऽलङ्कारादिवाक्प्रपञ्चः । १२. -मन्यः कवित्वस्य अ०, १०, स०, द०, म०, ल० । १३. सूत्रपतनायितम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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