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________________ ६४६ आदिपुराणम् निवति पायान्तर । शुक्लध्यान-ध्यानका एक भेद सत्संख्याधनुयोग-१ सत् २ । सम्यग्ज्ञान-जीवादि पदार्थोंको इसके चार भेद हैं १ पृथक्त्व संख्या ३ क्षेत्र ४ स्पर्शन ५ यथार्थताको प्रकाशित वितर्कवीचार २ एकत्व काल ६ अन्तर ७ भाव करनेवाला ज्ञान वितर्क ३ सूक्ष्मक्रियाप्रति- और ८ अल्प बहुत्व २४।११८ पाति और ४ व्युपरतक्रिया २४.९७ सम्यग्दर्शन-सच्चे देव-शास्त्र. सदर्शन-दर्शन प्रतिमा श्रावककी गुरुका श्रद्धान अथवा २१११६६.२०० | पहली प्रतिमा जिसमें आठ । जीवादि सात तत्त्वोंका श्रद्धा-सम्यग्दर्शनका पर्यायान्तर मूल गुणोंके साथ सम्यग्दर्शन . श्रद्धान नाम धारण करना पड़ता है ९।१२१,-१२२ ९।१२३ १०।१५९ सपिःस्राविन्-घतस्राविणो ऋद्धिश्रमण संघके चार भेद-१ ऋषि सप्तांग-कथामुखके निम्नलिखित के धारक २ मुनि ३ यति ४ अनगार सात अंग हैं-१ द्रव्य २ २०७२ २५।६ क्षेत्र ३ तीर्थ ४ काल ५ । सर्वतोभद्र-एक प्रतका नाम श्रुतकेवली-पूर्ण श्रुतज्ञानके धारक भाव ६ महाफल और ७.२३ प्रकृत सर्वावधि - अवधिज्ञानका एक २०६१ १।१२२ श्रुतज्ञान-एक व्रतका नाम, इसकी सप्ताम्बुधि-सात सागर २०६६ विधि ६ठे पर्वके १४६ से - १५१ श्लोक तक है ५।१४३ सौंषधि-एक ऋद्धि ६।१४१ समता-सामायिक नामक तीसरी २०७१ श्रुतज्ञानविधि-एक तप प्रतिमा, इसमें दिनमें ३ बार सल्लेखना-समाधिमरण ७५३ कमसे-कम दो-दो घड़ी ५।२४८ श्रेणीचारण-चारणऋद्धिका एक । पर्यन्त सामायिक करना सामानिक-देवोंका एक भेद जो सामानिक-देवा भेद पड़ता है कि इन्द्रके माता-पिता २०७३ आदिके तुल्य होता है १०।१५९ श्रेणीव-श्रेणोके अनुसार बसे समाहित-समाधिमरणसे युक्त । हुए विमान सिद्-अष्ट कर्मसे रहित त्रिलोक पुरुष . १०११८७ के अग्र भागपर निवास . १०।११८ करनेवाले जीव पदव्य-जीव, पुद्गल, धर्म, सम्यकचारित्र-मोक्षाभिलाषी एवं २४.१३० अधर्म, आकाश और काल संसारसे निःस्पृह मुनिकी | सिद्धके पाठ गुण-१ सम्यक्त्व ये छह द्रव्य हैं माध्यस्थ वृत्तिको सम्यक्- २ दर्शन ३शान ४वीर्य २११८ चारित्र कहते हैं . ५ सोक्षम्य ६ अवगाहन ७ २४।११९ अव्यावाघ ८ बगुरुलघुता सचित्तसेवाविरति-सचित्त त्याग - सम्यक्स्वभावना-संवेग, प्रथम, २०१२२३-२२४ नामक पांचवों प्रतिमा। स्थैर्य, असंमूढता, अस्मय- सुदर्शन-एक तप इसमें सचित्त वनस्पति तथा गर्व नहीं करना, बास्तिक्य ভাও कच्चे पानीका त्याग और अनुकम्पा ये सम्यक्त्व सुषमा- अवपिणीका दूसरा होता है भावनाएं है १०१५९ . २११९७ ३३१७
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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