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________________ ६३४ आदिपुराणम् भगवञ्चरणन्यासप्रदेशेऽधिनमास्थलम् । मृदुस्पर्शमुदारश्रि पङ्कजं हैममुद्वमौ ॥२७॥ पृष्ठतश्च पुरश्चास्य पमाः सप्त विकासिनः । प्रादुर्बभूवुरुद्गन्धिसान्द्र किझल्करेणवः ।।२७॥ तथान्यान्यपि पद्मानि तत्पर्यन्तेषु रेजिरे । लक्ष्यावसथ सौधानि संचारीणीव खाङ्गणे ॥२७॥ हेमाम्मोजमयां श्रेणीमलिश्रेणिमिरन्विताम् । सुरा व्यरचय ना सुरराजनिदेशतः ॥२७॥ रेजे राजोवराजी सा "जिनपरपङ्कजोन्मुखी। आदित्सुरिव 'तत्कान्तिमतिरेकादधःस्रताम् ॥२७॥ ततिविहारपद्मानां जिनस्योपानि सा बभौ । नभःसरसि संफुल्ला त्रिपञ्चककृतप्रमा ॥२७॥ तदा हेमाम्बुजैव्योम समन्तादाततं बभौ । सरोवरमिवोरफुल्लपङ्कजं जिनदिग्जये ॥२७९॥ प्रमोदमयमातम्वचिति विश्वं जगत्पतिः । विज्ञहार महीं कृत्स्ना प्रीणयन् स्ववचोऽमृतैः ।।२८०॥ मिथ्यान्धकारघटनां विघटय्य वोऽशुभिः । जगदुद्योतयामास जिनार्को जनतातिहत् ॥२८॥ यतो विजहे मगवान् हेमाब्जन्यस्तसत्क्रमः। धर्मामृताम्बुसंवस्ततों मम्या तिं दधुः ॥२८॥ जिने घन' इवाभ्यणे धर्मवर्ष प्रवर्षति । जगत्सुखप्रवाहेण पुप्लुबे धृतनिर्वृतिः" ॥२८३॥ धर्मवारि जिनाम्भोदात्पायं पायं कृतस्पृहाः। चिरं धृततृषो"दध्रुस्तदानीं मम्यचातकाः ॥२८॥ जिसके दल अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं, जिसका स्पर्श कोमल है और जो उत्कृष्ट शोभासे सहित है ऐसा सुवर्णमय कमलोंका समूह आकाशतलमें भगवान्के चरण रखनेकी जगहमें सुशोभित हो रहा था ।।२७२-२७॥ जिनकी केसरके रेणु उत्कृष्ट सुगन्धिसे सान्द्र हैं ऐसे वे प्रफुल्लित कमल सात तो भगवानके आगे प्रकट हुए थे और सात पीछे ।।२७४|| इसी प्रकार और कमल भी उन कमलोंके समीपमें सुशोभित हो रहे थे, और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो आकाशरूपी आँगनमें चलते हुए लक्ष्मीके रहनेके भवन ही हों ॥२७५।। भ्रमरोंकी पक्तियोंसे सहित इन सुवर्णमय कमलोंकी पक्तिको देवलोग इन्द्रकी आज्ञासे बना रहे थे ।।२७६।। जिनेन्द्र भगवान्के चरणकमलोंके सम्मुख हुई वह कमलोंकी पक्ति ऐसी जान पड़ती थी मानो अधिकताके कारण नीचेकी ओर बहती हई उनके चरणकमलोंकी कान्ति ही प्राप्त करना चाहते हों ॥२७७॥ आकाशरूपी सरोवर में जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंके समीप प्रफुल्लित हुई वह विहार कमलोंकी पक्ति पन्द्रहके वर्ग प्रमाण अर्थात् २२५ कमलोंकी थी ॥२७२।। उस समय, भगवान्के दिग्विजयके कालमें सुवर्णमय कमलोंसे चारों ओरसे व्याप्त हुआ आकाश ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिसमें कमल फूल रहे हैं ऐसा सरोवर ही हो ॥२७६।। इस प्रकार समस्त जगत्के स्वामी भगवान् वृषभदेवने जगत्को आनन्दमय करते हुए तथा अपने वचनरूपी अमृतसे सबको सन्तुष्ट करते हुए समस्त पृथिवीपर विहार किया था ॥२८०|| जनसमूहकी पीड़ा हरनेवाले जिनेन्द्ररूपी सूर्यने वचनरूपी किरणोंके द्वारा मिथ्यात्वरूपी अन्धकारके समूहको नष्ट कर समस्त जगत् प्रकाशित किया था ।।२८१॥ सुवर्णमय कमलोंपर पैर रखनेवाले भगवान्ने जहाँ-जहाँसे विहार किया वहीं-वहींके भव्योंने धर्मामृतरूप जलकी वर्षासे परम सन्तोष धारण किया था ।।२८२|| जिस समय वे जिनेन्द्ररूपी मेघ समीपमें धर्मरूपी अमृतकी वर्षा करते थे उस समय यह सारा संसार सन्तोष धारण कर सुखके प्रवाहसे प्लुत हो जाता था-सुखके प्रवाहमें डूब जाता था ॥२८॥ उस समय अत्यन्त लालायित हुए भव्य जीवरूपी चातक जिनेन्द्ररूपी मेघसे धर्मरूपी जलको बार-बार पी १. निवासहाणि । २. रचयन्ति स्म । ३. पङ्क्तिः । ४. जिनपादकमलोन्मुखी । ५. आदातुमिच्छुः। ६. पदकमलकान्तिम् । ७. यस्मिन् । ८. तस्मिन् । ९. मेघ इव । १०. मज्जति स्म। ११. धृतसुखम् । १२. पीत्वा पीत्वा । १३. धृतिमाययुः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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