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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व वसन्ततिलकावृत्तम् इत्थं चराचरगुरुजगदुजिहीर्षन्' संसारखाननिमग्नममग्नवृत्तिः । देवासुरैरनुगतो विजहार पृथ्वी हेमाब्जगर्मविनिवेशितपादपद्मः ॥२८५॥ तीव्राजवअवदवानलदह्यमान माहादयन् भुवनकाननमस्ततापः । धर्मामृताम्बुपृषतैः परिषिच्य देवो रेजे घनागम इवोदितदिव्यनादः ॥२८६॥ काशीमवन्तिकुरुकोसलसुझपुण्ड्रान् चेद्यङ्गवङ्गमगधान्ध्रकलिङ्गमद्रान् । पाञ्चालमालवदशाणविदर्मदेशान सन्मार्गदेशनपरो विजहार धीरः ॥२८७॥ देवः प्रशान्तचरितः शनकैविहृत्य देशान् बहु निति विबोधितमभ्यसरवः । भेजे जगत्त्रयगुरुविधुवीध मुच्चैः कैलासमात्मयशसोऽनुकृतिं दधानम् ॥२४॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् तस्याने सुरनिर्मिते सुरुचिरे श्रीमत्समामले पूर्वोक्ताखिलवाना परिगते स्वर्गभियं तवति । श्रीमान् द्वादशमिर्गुणैः परिवृतो. भवस्या नतैः सादरैः आसामास' विभुर्जिनः प्रविलसस्सस्प्रातिहार्याष्टकः ॥२८९।। कर चिरकालके लिए सन्तुष्ट हो गये थे ।।२८४|| इस प्रकार जो चर और अचर जीवोंके स्वामी हैं, जो संसाररूपी गर्त में डूबे हुए जीवोंका उद्धार करना चाहते हैं, जिनकी वृत्ति अखण्डित है, देव और असुर जिनके साथ हैं तथा जो सुवर्णमय कमलोंके मध्यमें चरणकमल रखते हैं ऐसे जिनेन्द्र भगवान्ने समस्त प्रथ्वीमें विहार किया ॥२८५|| उस समय. संसाररूपी तीव्र दावानलसे जलते हुए संसाररूपी वनको धर्मामृतरूप जलके छीटोंसे सींचकर जिन्होंने सबका सन्ताप दूर कर दिया है और जिनके दिव्यध्वनि प्रकट हो रही है ऐसे वे भगवान् वृषभदेव ठीक वर्षाऋतुके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२८६।। समीचीन मार्गके उपदेश देनमें तत्पर तथा धीर-वीर भगवान्ने काशी, अवन्ति, कुरु, कोशल, सुझ, पुण्ड, चेदि, अंग, वंग, मगध, आन्ध्र, कलिंग, मद्र, पंचाल, मालव, दशार्ण और विदर्भ आदि देशोंमें बिहार किया था ।।२८७ो इस प्रकार जिनका चरित्र अत्यन्त शान्त है, जिन्होंने अनेक भव्य जीवोंको तत्त्वज्ञान प्राप्त कराया है और जो तीनों लोकोंके गुरु हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव अनेक देशोंमें विहार कर चन्द्रमाके समान उज्ज्वल, ऊँचे और अपना अनुकरण करनेवाले कैलास पर्वतको प्राप्त हुए ॥२८८॥ वहाँ उसके अग्रभागपर देवोंके द्वारा बनाये हु हए, सन्दर, पूर्वोक्त समस्त वर्णन सहित और स्वर्गकी शोभा बढानेवाले सभामण्डपमें विराजमान हुए। उस समय वे जिनेन्द्रदेव अनन्तचतुष्टयरूप लक्ष्मीसे १. उद्धत्तुमिच्छन् । २. गर्त । ३. बिन्दुभिः । पुषन्ती बिन्दु पृषता स पुमांसो विप्रषस्त्रियः । ४. चेदि अङ्ग । ५. प्रकर्षण शासवर्तनः । ६. विमल । ७. अनुकरणम् । ८. वर्णनायुक्ते । ९. वास्ते स्म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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