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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व ६२३ . ज्ञानगर्भो दयागर्भो रत्नगर्भः प्रभास्वरः । पद्मगर्भो जगद्गर्भो हेमगर्भः सुदर्शनः ॥१८॥ लक्ष्मीवास्त्रिदशाध्यक्षो गुढीयानिन ईशिता । मनोहरो मनोज्ञाङ्गो' धीरो गम्भीरशासनः ॥१८२॥ धर्मयूपो दयायागो धर्मनेमिर्मुनीश्वरः । धर्मचक्रायुधो देवः कर्महा धर्मघोषणः ॥१८३॥ अमोघवागमोधाशो निर्मलोऽमोघशासनः । सुरूपः सुभगस्त्यागी समयज्ञः समाहितः ॥१८॥ सुस्थितः स्वास्थ्यमाक् स्वस्थो नीरजस्को निरुद्धवः । अलंपो निष्कलङ्कारमा वीतरागो गतस्पृहः ।।४५। वश्येन्द्रियो विमुक्तात्मा निःसपत्नो जितेन्द्रियः । प्रशान्तोऽनन्त धामर्षिर्मङ्गलं मलहानघः ॥१८६॥ तर्क-वितर्करहित स्वरूपसे युक्त होनेके कारण अप्रतात्मा ७१५, समस्त कृत्य जाननेसे कृतज्ञ ७१६ और समस्त पदार्थोंका लक्षणस्वरूप बतलानेसे कृतलक्षण ७१७ कहलाते हैं ॥१८०|| अन्तरंगमें ज्ञान होनेसे ज्ञानगर्भ ७१८, दयालुहृदय होनेसे दयागर्भ ७१६, रत्नत्रयसे युक्त होनेके कारण अथवा गर्भ कल्याणके समय रत्नमयी वृष्टि होनेसे रत्नगर्भ ७२०, देदीप्यमान होनेसे प्रभास्वर ७२१, कमलाकार गर्भाशयमें स्थित होनेके कारण पद्मगर्भ ७२२, ज्ञानके भीतर समस्त जगत्के प्रतिबिम्बित होनेसे जगद्गर्भ ७२३, गर्भवासके समय पृथिवीके सुवर्णमय हो जाने अथवा सुवर्णमय वृष्टि होनेसे हेमगर्भ ७२४ और सुन्दर दर्शन होनेसे सुदर्शन ७२५ कहलाते हैं ॥१८१।। अन्तरंग तथा बहिरंग लक्ष्मीसे युक्त होनेके कारण लक्ष्मीवान् ७२६, देवोंके स्वामी होनेसे त्रिदशाध्यक्ष ७२७, अत्यन्त दृढ़ होनेसे द्रढीयान् ७२८, सबके स्वामी होनेसे इन ७२६, सामर्थ्यशाली होनेसे ईशिता ७३०, भव्यजीवोंका मनहरण करनेसे मनोहर ७३१, सुन्दर अंगोंके धारक होनेसे मनोज्ञांग ७३२, धैर्यवान होनेसे धीर ७३३ और शासनकी गम्भीरतासे गम्भीरशासन ७३४ कहलाते हैं ।।१८२॥ धर्मके स्तम्भरूप होनेसे धर्मयूप ७३५, दयारूप यज्ञके करनेवाले होनेसे दयायाग ७३६, धर्मरूपी रथकी चक्रधारा होनेसे धर्मनेमि ७३७, मुनियोंके स्वामी होनेसे मुनीश्वर ७३८, धर्मचक्ररूपी शस्त्रके धारक.होनेसे धर्मचक्रायुध ७३९, आत्मगुणोंमें क्रीड़ा करनेसे देव ७४०, कर्मोंका नाश करनेसे कर्महा ७४१, और धर्मका उपदेश देनेसे धर्मघोषण ७४२ कहलाते हैं ।।१८।। आपके वचन कभी व्यर्थ नहीं जाते इसलिए अमोघवाक् ७४३, आपकी आज्ञा कभी निष्फल नहीं होती इसलिए अमोघाज्ञ ७४४, मलरहित है इसलिए निर्मल ७४५, आपका शासन सदा सफल रहता है इसलिए अमोघशासन ७४६, सुन्दर रूपके धारक हैं इसलिए सुरूप ७४७, उत्तम ऐश्वर्य युक्त हैं इसलिए सुभग ७४८, आपने पर पदार्थोंका त्याग कर दिया है इसलिए त्यागी ७४२, सिद्धान्त, समय अथवा आचार्यके ज्ञाता हैं इसलिए समयज्ञ ७५० और समाधानरूप हैं इसलिए समाहित ७५१ कहलाते हैं ॥१४॥ सुखपूर्वक स्थित रहनेसे सुस्थित ७५२, आरोग्य अथवा आत्मस्वरूपकी निश्चलताको प्राप्त होनेसे स्वास्थ्यभाक् ७५३, आत्मस्वरूपमें स्थित होनेसे स्वस्थ ७५४, कर्मरूप रजसे रहित होनेके कारण नीरजस्क ७५५, सांसारिक उत्सवोंसे रहित होनेके कारण निरुद्धव ७५६, कर्मरूपी लेपसे रहित होनेके कारण अलेप ७५७, कलंकरहित आत्मासे युक्त होनेके कारण निष्कलंकात्मा ७५८, राग आदि दोषोंसे रहित होनेके कारण वीतराग ७५९ और सांसारिक विषयोंकी इच्छासे रहित होनेके कारण गतस्पृह ७६० कहलाते हैं ॥१८॥ आपने इन्द्रियोंको वश कर लिया है इसलिए वश्येन्द्रिय ७६१ कहलाते हैं, आपकी आत्मा कर्मबन्धनसे छूट गयी है १.मनोज्ञाों-इ०। २. उत्कृष्टो धवः उद्धवः उद्धवः नि:क्रान्तो निरुद्धवः । ३. अनन्ततेजाः। ४. मलं पापं हन्तीति ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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