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________________ ६२२ आदिपुराणम् सत्यात्मा सत्यविज्ञानः सत्यवाक् सत्यशासनः । सत्याशीः सत्यसंधानः सत्यः सत्यपरायणः ॥१७५॥ स्थेयान स्थवीयान्न दीयान् दवीयान् दूरदर्शनः । भणोरणीयाननणुर्गुरुराद्यो गरीयसाम् ॥१७६॥ सदायोगः सदाभोगः सदातृप्तः सदाशिवः । सदागतिः सदासौख्यः सदाविद्यः सदोदयः ॥ १७७॥ सुघोषः सुमुखः सौम्यः सुखदः सुहितः सुहृत् । सुगुप्तो गुप्तिभृद् गोप्ता लोकाध्यक्षो दमीश्वरः ॥१७८। इति असंस्कृतादिशतम् । वृहबृहस्पतिर्वाग्मी वाचस्पतिरुदारधीः । मनीषी धिषणो धीमान् शेमुषीशो गिरां पतिः ॥१७॥ नैकरूपो नयोत्तुङ्गो नैकारमा नैकधर्मकृत् । अविशेयोऽप्रतारमा कृतज्ञः कृतलक्षणः ॥१८॥ सत्य विज्ञान ६६७, सत्यवचन होनेसे सत्यवाक् ६६८, सत्यधर्मका उपदेश देनेसे सत्यशासन ६६९, सत्य आशीर्वाद होनेसे सत्याशी ६७०, सत्यप्रतिज्ञ होनेसे सत्यसन्धान ६७१, सत्यरूप होनेसे सत्य ६७२ और सत्यमें ही निरन्तर तत्पर रहनेसे सत्यपरायण ६७३ कहलाते हैं ।।१७।। अत्यन्त स्थिर होनेसे स्थेयान् ६७४, अतिशय स्थूल होनेसे स्थवीयान् ६७५, भक्तोंके समीपवर्ती होनेसे नेदीयान् ६७६, पापोंसे दूर रहने के कारण दवीयान् ६७७, दूरसे ही दर्शन होनेके कारण दूरदर्शन ६७८, परमाणुसे भी सूक्ष्म होने के कारण अणोःअणीयान् ६७९, अणुरूप न होनेसे अनण ६८० और गरुओंमें भी श्रेष्ठ गरु होनेसे गरीयसामाद्य* गुरु ६८१ कहलाते है ॥१७६|| सदा योगरूप होनेसे सदायोग ६८२, सदा आनन्दके भोक्ता होनेसे सदाभोग ६८३, सदा सन्तुष्ट रहनेसे सदातृप्त ६८४, सदा कल्याणरूप रहनेसे सदा शिव ६८५, सदा ज्ञानरूप रहनेसे सदागति ६८६. सदा सखरूप रहनेसे सदासौख्य ६८७, सदा केवलज्ञानरूपी विद्यासे युक्त होनेके कारण सदाविद्य ६८८ और सदा उदयरूप रहनेसे सदोदय ६८९ माने जाते हैं ॥१७॥ उत्तमध्वनि होनेसे सुघोष ६९०, सुन्दर मुख होनेसे सुमुख ६९१, शान्तरूप होनेसे सौम्य ६९२, सब जीवोंको सुखदायी होनेसे सुखद ६९३, सबका हित करनेसे सुहित ६९४, उत्तम हृदय होनेसे सुहृत् ६९५, सुरक्षित अथवा मिथ्यादृष्टियोंके लिए गूढ़ होनेसे सुगुप्त ६९६, गुप्तियोंको धारण करनेसे गुप्तिभृत् ६९७, सबके रक्षक होनेसे गोप्ता ६९८, - तीनों लोकोंका साक्षात्कार करनेसे लोकाध्यक्ष ६९६ और इन्द्रियविजयरूपी दमके स्वामी होनेसे दमेश्वर ७०० कहलाते हैं ॥१७॥ इन्द्रोंके गुरु होनेसे बृहबृहस्पति ७०१, प्रशस्त वचनोंके धारक होनेसे वाग्मी ७०२, वचनोंके स्वामी होनेसे वाचस्पति ७०३, उत्कृष्ट बुद्धिके धारक होनेसे उदारधी ७०४, मनन शक्तिसे युक्त होनेके कारण मनीषी ७०५, चातुर्यपूर्ण बुद्धिसे सहित होनेके कारण धिषण ७०६, धारणपटु बुद्धिसे सहित होनेके कारण धीमान ७०७, बुद्धिके स्वामी होनेसे शेमुषीश ७०८ और सब प्रकारके वचनोंके स्वामी होनेसे गिरापति ७०९ कहलाते हैं ॥ १७९ ॥ अनेकरूप होनेसे नैकरूप ७१०. नयोंके द्वारा उत्कृष्ट अवस्थाको प्राप्त होनेसे नयोत्ता ७११, अनेक गुणोंको धारण करनेसे नैकात्मा ७१२, वस्तुके अनेक धर्मोका उपदेश देनेसे नैकधर्मकृत् ७१३, साधारण पुरुषोंके द्वारा जाननेके अयोग्य होनेसे अविज्ञेय ७१४, १. सत्यप्रतिशः । २. स्थिरतरः । ३. स्थूलतरः। ४. समीपस्थः। ५. दूरस्थः। ६. रक्षकः । ७. सम्पूर्णलक्षणः। यहाँपर 'गरीयसामाद्य' और गरीयसां गुरु' इस प्रकार दो नाम भी निकलते हैं परन्तु इस पक्ष में ६२७ और ६२८ इन दो नामोंके स्थानमें 'जातसुव्रत' ऐसा एक नाम माना जाता है।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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