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________________ ६१५ पञ्चविंशतितमं पर्व एकविद्यो महाविद्यो मुनिः परिवृढः पतिः । धीशो विद्यानिधिः साक्षी विनेता विहतान्तकः ॥१४॥ पिता पितामहः पाता पवित्रः पावनो गतिः । त्राता भिषग्वरो वों वरदः परमः पुमान् ॥१४२॥ कविः पुराणपुरुषो वर्षीयान् वृषभः पुरुः । प्रतिष्ठा प्रसवो हेतुर्भुवनैकपितामहः ॥१४३॥ इति महादिशतम् । श्रीवृक्षलक्षणः श्लक्ष्णौ लक्षण्यः शुभलक्षणः । निरक्षः पुण्डरीकाक्षः पुष्कलः पुष्करेक्षणः ॥१४॥ इसलिए सुनयतत्त्वविद् ३७० कहलाते हैं ॥१४०॥ आप केवलज्ञानरूपी एक विद्याको धारण करनेसे एकविद्य ३७१ कहलाते हैं, अनेक बड़ी-बड़ी विद्याएँ धारण करनेसे महाविद्य ३७२ कहे जाते हैं, प्रत्यक्षज्ञानी होनेसे मुनि ३७३ हैं, सबके स्वामी हैं इसलिए परिवृढ़ ३७४ कहलाते हैं, जगत्के जीवोंकी रक्षा करते हैं इसलिए पति ३७५ हैं, बुद्धिके स्वामी हैं इसलिए धीश ३७६ कहलाते हैं, विद्याओंके भण्डार हैं इसलिए विद्यानिधि ३७७ माने जाते हैं, समस्त पदार्थोंको प्रत्यक्ष जानते हैं इसलिए साक्षी ३७८ कहलाते हैं, मोक्षमागको प्रकट करनेवाले हैं इसलिए विनेता ३७६ कहे जाते हैं और यमराज अर्थात् मृत्युको नष्ट करनेवाले हैं इसलिए विहतान्तक ३८० कहलाते हैं ।।१४१॥ आप सब जीवोंकी नरकादि गतियोंसे रक्षा करते हैं इसलिए पिता ३८१ कहलाते हैं, सबके गुरु हैं. इसलिए पितामह ३८२ कहे जाते हैं, सबका पालन करनेसे पाता ३८३ कहलाते हैं, अतिशय शुद्ध हैं इसलिए पवित्र ३८४ कहे जाते हैं, सबको शुद्ध या पवित्र करते हैं इसलिए पावन ३८५ माने जाते हैं, समस्त भव्य तपस्या करके आपके ही अनुरूप होना चाहते हैं इसलिए आप सबकी गति ३८६ अथवा खण्डाकार छेद निकालनेपर गतिरहित होनेसे अगति कहलाते हैं, समस्त जीवोंकी रक्षा करनेसे त्राता ३८७ कहलाते हैं, जन्म-जरामरणरूपी रोगको नष्ट करनेके लिए उत्तम वैद्य हैं इसलिए भिषग्वर ३८८ कहे जाते हैं, श्रेष्ठ होनेसे वय ३८९ हैं, इच्छानुकूल पदार्थोंको प्रदान करते हैं इसलिए वरद ३९० कहलाते हैं, आपकी ज्ञानादि लक्ष्मी अतिशय श्रेष्ठ है इसलिए परम ३९१ कहे जाते हैं, और आत्मा तथा पर पुरुषोंको पवित्र करनेके कारण पुमान् ३९२ कहलाते हैं ॥१४२॥ द्वादशांगका वर्णन करनेवाले हैं इसलिए कवि ३९३ कहलाते हैं, अनादिकाल होनेसे पुराणपुरुष ३९४ कहे जाते हैं, ज्ञानादि गुणोंको अपेक्षा अतिशय वृद्ध हैं इसलिए वर्षीयान् ३९५ कहलाते हैं, श्रेष्ठ होनेसे ऋषभ ३९६ कहलाते हैं, तीर्थकरोंमें आदिपुरुष होनेसे पुरु ३९७ कहे जाते हैं, आप प्रतिष्ठा अर्थात् सम्मान अथवा स्थिरताके कारण हैं इसलिए प्रतिष्ठाप्रसव ३९८ कहलाते हैं, समस्त उत्तम कार्योंके कारण हैं इसलिए हेतु ३९९ कहे जाते हैं, और संसारके एकमात्र गुरु हैं. इसलिए भुवनैकपितामह ४०० कहलाते हैं ॥१४॥ श्रीवृक्षके चिह्नसे चिह्नित हैं इसलिए श्रीवृक्षलक्षण ४०१ कहे जाते हैं, सूक्ष्मरूप होनेसे श्लक्ष्ण ४०२ कहलाते हैं, लक्षणोंसे अनपेत अर्थात् सहित हैं इसलिए लक्षण्य ४०३ कहे जाते हैं, आपके शरीरमें अनेक शुभ लक्षण विद्यमान हैं इसलिए शुभलक्षण ४०४ कहलाते हैं, आप समस्त पदार्थोंका निरीक्षण करनेवाले हैं अथवा आप नेत्रेन्द्रियके द्वारा दर्शन-क्रिया नहीं करते इसलिए निरीक्ष ४०५ कहलाते हैं, आपके नेत्र पुण्डरीककमलके समान सुन्दर हैं इसलिए १. प्रत्यक्षज्ञानी। २. पालकः । ३. काव्यकर्ता । ४. वृद्धः । ५. ज्ञानी। ६. प्रतिष्ठायाः स्थैर्यस्य प्रसवो यस्मात् । ७. सूक्ष्मः । ८. लक्षणवान् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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