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________________ चतुर्विंशतितमं पर्व चलच्चामरसंघातवीज्यमानमहातनुम् । प्रपतमिरं मेरुरिव चामीकरच्छविम् ॥२२॥ महाशोकतरोर्मूले छत्रत्रितयसंश्रितम् । 'विधाभूतावधूमासिबलाहकमिवाद्रिपम् ॥२३॥ पुष्पवृष्टिप्रतानेन परितो भ्राजितं प्रभुम् । कलाद्रुमप्रगलितप्रसूनमिव मन्दरम् ॥२४॥ नमो न्यापिमिरुद्घोषं सुरदुन्दुभिनिःस्वनैः । प्रसरवेलमम्मोधिमिव वावविर्णितम् ॥२५॥ धीरध्वानं प्रवर्षन्तं धर्मामृतमतर्कितम् । आह्वादितजगत्प्राणं प्रावृषेण्य मिवाम्बुदम् ॥२६॥ स्वदेहविसरज्योत्स्नासलिलक्षालितालिलम् । क्षीराब्धिमध्यसद्वृद्धमिव भूभ्रं हिरण्मयम् ॥२७॥ सोऽन्य प्रदक्षिणीकृस्य भगवन्तं जगद्गुरुम् । इयाज मायजूकानां ज्यायान्प्राज्य ज्यया प्रभुम् ॥२८॥ पूजान्ते प्रणिपत्येशं महीनिहित जान्वसौ । वचःप्रसूनमालामिरित्यानर्च गिरां पतिम् ॥२९॥ त्वं ब्रह्मा परमज्योतिस्त्वं प्रभूष्णुरजोऽरजाः । स्वमादिदेवो देवानामधिदेवो महेश्वरः ॥३०॥ त्वं स्रष्टा स्वं विधातासि त्वमीशानः पुरुः पुमान्"। स्वमाविषुरुषो विश्वेट "विश्वारा विश्वतोमुखः ।। ऋद्धियोंको धारण करनेवाले जिनेन्द्र वृषभदेवको देखा।।२।। दुरते हुए चमरोंके समूहसे जिनका विशाल शरीर संवीज्यमान हो रहा है और जो सुवर्णके समान कान्तिको धारण करनेवाले हैं ऐसे वे भगवान् उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसके चारों ओर निर्झरने पड़ रहे हैं ऐसा सुमेरु पर्वत ही हो ।।२२॥ वे भगवान् बड़े भारी अशोकवृक्षके नीचे तीन छत्रोंसे सुशोभित थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसपर तीन रूप धारण किये हुए चन्द्रमासे सुशोभित मेघ छाया हुआ है ऐसा पर्वताका राजा सुमेरु पर्वत ही हो ।२॥ वे भगवान् चारों ओरसे पुष्पवृष्टि के समूहसे सुशोभित थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसके चारों ओर कल्पवृक्षोंसे फल गिरे हुए हैं ऐसा सुमेरु पर्वत ही हो ॥२४॥ आकाशमें व्याप्त होनेवाले देवदुन्दुभियोंके शब्दोंसे भगवान के समीप ही बड़ा भारी शब्द हो रहा था जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो वायुके द्वारा चलायमान हुआ और जिसकी लहरें किनारे तक फैल रही हैं ऐसा समुद्र ही हो ॥२५॥ जिसका शब्द अतिशय गम्भीर है और जो जगत्के समस्त प्राणियोंको आनन्दित करनेवाला है ऐसे सन्देहरहित धर्मरूपी अमृतकी वर्षा करते हुए भगवान् वृषभदेव ऐसे जान पड़ते थे मानो गरजता हुआ और जलवषो करता हुआ वा बादल ही हो ।।२६।। अपने शरीरकी फैलती हुई प्रभारूपी जलसे जिन्होंने समस्त प्रभाको प्रक्षालित कर दिया है, वे भगवान् ऐसे जान पड़ते थे मानो क्षीरसमुद्र के बीच में बढ़ा हुआ सुवर्णमय पर्वत ही हो रखा इस प्रकार आठ प्रातिहार्यरूप ऐश्वर्यसे युक्त और जगत्के गुरु स्वामी वृषभदेवको देखकर पूजा करनेवालों में श्रेष्ठ भरतने उनकी प्रदक्षिणा दी और -फिर उत्कृष्ट सामग्रीसे उनकी पूजा की॥२८पूजाके बाद महाराज भरतने अपने दोनों घुटने जमीनपर रखकर सब भाषाओंके स्वामी भगवान् वृषभदेवको नमस्कार किया और फिर वचनरूपी पुष्पोंकी मालाओंसे उनकी इस प्रकार पूजा की अर्थात् नीचे लिखे अनुसार स्तुति की ॥२९॥ हे भगवन् , आप ब्रह्मा हैं, परम ज्योतिस्वरूप हैं, समर्थ हैं, जन्मरहित हैं, पापरहित हैं, मुख्यदेव अथवा प्रथम तीर्थकर हैं, देवोंके भी अधिदेव और महेश्वर हैं ॥३०॥ आप ही १. रूप्येण चन्द्रेणोद्भासितमेघम् । २. प्रावृषि भवम् । ३. प्रक्षालितसकलपदार्थम् । ४. अनुकूलो भूत्वा पश्चाद्वा । ५. पूजयामास। ६. इज्याशीलानाम् । 'इज्याशीलो यायजूकः' इत्यभिधानात्। ७. भूरिपूजया। ८. मह्यां निक्षिप्तं बानु यस्मिन् कर्मणि । ९. वक्ष्यमाणप्रकारेण । १०.कर्मरजोरहितः । ११. पुनातीति पुमान् । १२. विश्वस्मिन् राजते इति । नका
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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