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________________ आदिपुराणम् विजितकमबदलविडसदसशाशं सुरखुवतिनयनमधुकरततवपुषम् । वृषभमजरमजममरपतिसुमहितं नमत परम मतममितरुचिमृषिपतिम् ॥१७॥ __ मालिनीवृत्तम् सरसिजनिमवक्त्रं पद्मकिरगौरं कमलदलविशालव्यायतास्पन्दिनेत्रम् । सरसिरुहसमानामोदमछायमन्डस्फटिकमणिविभासि श्रीजिनस्यागमोडे ।।१७२॥ नयनयुगमतानं बक्ति कोपज्यपायं भ्रुकुटिरहितमास्यं शान्तता यस्य शास्ति । मदनजयमपाङ्गालोकनापावसौम्यं प्रकटयति यवङ्गं तं जिनं नम्न मीमि ॥१७॥ अपभगजविलसितवृत्तम् गात्रमनङ्गमावतिसुरमिरुचिरं मेत्रमतानमत्यमलतररुचिविसरम्। . वक्त्रमदष्टसाशन वसनमिव हसबस्य विमाति तं जिनमवनमत सुधियः ॥१७॥ सौम्पवक्त्रममलकमदनिमाशं हेमपुजसडशवपुषमृषभमृषिपम् । - रक्तपद्मरुचिकृतमलमृदुपदबुर्ग सतोऽस्मि परमपुरुषमपरुर्ष गिरम् ।।१०५॥ भगवानका मुखकमल इतना अधिक सुन्दर था कि देवांगनाएँ उसे देखते हुए सन्तुष्ट ही न हो पाती थीं ॥१७०॥ जिनके अनुपम नेत्र कमलदलको जीतते हुए सुशोभित हो रहे हैं, जिनका शरीर देवांगनाओंके नेत्ररूपी भ्रमरसे व्याप्त हो रहा है, जो जरारहित हैं, जन्मरहित हैं, इन्द्रोंके द्वारा पूजित हैं, अतिशय इष्ट हैं अथवा जिनका मत अतिशय उत्कृष्ट है, जिनको कान्ति अपार है और जो ऋषियोंके स्वामी हैं ऐसे भगवान् वृषभदेवको हे भव्य जीवो, तुम सब नमस्कार करो ॥१७१॥ मैं श्रीजिनेन्द्रभगवानके उस शरीरकी स्तुति करता हूँ जिसका कि मुख कमलके समान है, जो कमलकी केशरके समान पीतवर्ण है, जिसके टिमकाररहित नेत्र कमलदलके समान विशाल और लम्बे हैं, जिसकी सुगन्धि कमलके समान थी, जिसकी छाया नहीं पड़ती और जो स्वच्छ स्फटिकमणिके समान सुशोभित हो रहा था ॥१७२॥ जिनके ललाईरहित दोनों नेत्र जिनके क्रोधका अभाव बतला रहे हैं, भौंहोंकी टेढ़ाईसे रहित जिनका मुख जिनकी शान्तताको सचित कर रहा है और कटाक्षावलोकनका अभाव होनेसे सौम्य अवस्थाको प्राप्त हुआ जिनका शरीर जिनके कामदेवकी विजयको प्रकट कर रहा है ऐसे उन जिनेन्द्र भगवानको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥१७॥ हे बुद्धिमान् पुरुषो, जिनका शरीर कामदेवको नष्ट करनेवाला अतिशय सुगन्धित और सुन्दर है, जिनके नेत्र ललाईरहित तथा अत्यन्त निर्मल कान्तिके समूहसे सहित है, और जिनका मुख ओंठोंको डसता हुआ नहीं है तथा हँसता हुआ-सा सुशोभित हो रहा है ऐसे उन वृषभजिनेन्द्रको नमस्कार करो ॥१७४।। जिनका मुख सौम्य है, नेत्र निर्मल कमलदलके समान हैं, शरीर सुवर्णके पुत्र के समान है, जो ऋषियोंके स्वामी हैं, जिनके निर्मल और कोमल चरणोंके युगल लाल कमलकी कान्ति धारण करते हैं, जो परम पुरुष हैं और जिनकी वाणी अत्यन्त कोमल है ऐसे श्री वृषभ १. उत्कृष्टशासनम् । २. पीतवर्ण । ३. शास्तृतां ट। शिक्षकत्वम् । ४. भृशं नमामि । ५. प्रास्ता. घरम् । ६. नमस्कारं कुरुतः। ७. सम्यक् प्रणतोऽस्मि । ८. कोमलवाचम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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