SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 653
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ त्रयोनिशं पर्व ५६३ प्रहरणकलिकावृत्तम् तव जिन ततदेहरुचिशरवणे चमररहततिः सितविहंगचिम् । इयमनुतनुते रुचिरतरतनुर्मणिमुकुटसमिदरुचिसुरधुता ॥१५३॥ . वसन्ततिलकावृत्तम् स्वरिष्यवागियमशेषपदार्थगर्मा भाषान्तराणि सकलानि निदर्शयन्ती । तत्वावबोधमचिरात् कुरुते पुषानां स्याद्वादनीति विहतान्धमतान्धकारा ॥१५॥ प्रक्षालवत्यखिलमेव मनोमल मस्वहारतीमबमिदं शुचिपुण्यमम् । तीर्थ तदेव हि विनेयजनाजबाबावारसम्तरणवम भवत्प्रणीतम् ॥१५५॥ त्वं सर्वगः सकलवस्तुगतावबोधस्वं सर्ववित्पमितविश्वपदार्थसार्थः। स्वं सर्वजिद्विदितमन्मथमोहशत्रुस्त्वं सर्वरनिखिसभाषविशेषदर्शी ॥१५६ स्वं तीर्थकृत्सकलपापमलापहारिसदमतीर्थ विमलीकरणकनिष्ठः। त्वं मन्त्रकृनिखिलपापविषापहारिपुण्यभूति प्रवरमन्त्रविधानचुम्बुः ॥१५॥ स्वामामनन्ति मुनयः पुरुषं पुराणं स्वां प्राहुरव्युतमृषीश्वरमक्षयर्बिम् । तस्माजवान्तक भवन्तमचिन्त्ययोगं योगीश्वरं जगदु पास्यमुपास्महे"स्म ॥१५॥ गमन करते हुए मदसे मनोहर शब्द कर रहे हैं। १५२॥ हे जिनेन्द्र, मणिमय मुकुटोंकी देदीप्यमान कान्तिको धारण करनेवाले देवोंके द्वारा ढोरी हुई तथा अतिशय सुन्दर आकारवाली यह आपके चमरोंकी पंक्ति आपके शरीरकी कान्तिरूपी सरोवरमें सफेद पक्षियों (हंसों)की शोभा बढ़ा रही है ।।१५३।। हे भगवन्, जिसमें संसारके समस्त पदार्थ भरे हुए हैं, जो समस्त भाषाओंका निदर्शन करती है अर्थात् जो अतिशय विशेषके कारण समस्त भाषाओंरूप परिणमन करती है और जिसने स्याद्वादरूपी नीतिसे अन्यमतरूपो अन्धकारको नष्ट कर दिया है ऐसी आपकी यह दिव्यध्वनि विद्वान् लोगोंको शीघ्र ही तत्त्वोंका ज्ञान करा देती है ॥१५४॥ हे भगवन, आपकी वाणीरूपी यह पवित्र पुण्य जल हम लोगोंके मनके समस्त मलको धो रहा है, वास्तवमें यही तीर्थ है और यही आपके द्वारा कहा हुआ धर्मरूपी तीर्थ भन्यजनोंको संसाररूपी समुद्रसे पार होनेका मार्ग है ॥१५५।। हे भगवन, आपका ज्ञान संसारकी समस्त वस्तुओं तक पहुँचा है-समस्त वस्तुओंको जानता है इसलिए आप सर्वग अर्थात् व्यापक हैं, आपने संसारके समस्त पदार्थोके समूह जान लिये हैं इसलिए आप सर्वज्ञ हैं, आपने काम और मोहरूपी शत्रुको जीत लिया है इसलिए आप सर्वजित् अर्थात् सबको जीतनेवाले हैं और आप संसारके समस्त पदार्थोंको विशेषरूपसे देखते हैं इसलिए आप सर्वदृक् अर्थात् सबको देखनेवाले हैं ॥१५६॥ हे भगवन, आप समस्त पापल्पी मलको नष्ट करनेवाले समीचीन धर्मरुपी तीर्थके द्वारा जीवोंको निर्मल करनेके लिए सदा तत्पर रहते हैं इसलिए आप तीर्थकर हैं और आप समस्त पापरूपी विषको अपहरण करनेवाले पवित्र शास्त्ररूपी उत्तम मन्त्रके बनानेमें चतुर हैं इसलिए आप मन्त्रकृत् हैं ॥१५७॥ हे भगवन्, मुनि लोग आपको ही पुराण पुरुष अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष ( पक्षमें ब्रह्मा) मानते हैं, आपको ही ऋषियोंके ईश्वर और अक्षय ऋद्धिको धारण करनेवाले अच्युत अर्थात् अविनाशी (पक्षमें विष्णु ) कहते हैं तथा आपको ही अचिन्त्य योगको धारण करनेवाले, और समस्त जगत्के उपासना करने योग्य १. सरसि । २. हंस । ३. अनुकरोति । ४. नय । ५. संसारसमुद्रोत्तरण। ६. सकलपदार्थप्राप्त. सानत्वात् उपर्यप्येव योज्यम् । ७. आगम । ८. प्रतीतः (समर्थः) । ९. जगदाराष्यम् । १०. बारापयामः स्म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy