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________________ आदिपुराणम् छन्दः (१) वृक्षोऽशोको मरकतरुचिरस्कन्धो माति श्रीमानयमतिरुचिराः शाखाः । बाहूकृत्य स्फुटमिव नटितं तन्वन्वातोड तः कलहतमधुकृन्मालः ॥१४९॥ पुष्पाकोणों नृसुरमुनिवरैः कान्तो मन्दं मन्दं मृदुतरपवना धूतः । सच्छायोऽयं विहतं नृशुगशोकोऽगो भाति श्रीमास्त्वमिव हि जगतां श्रेयः ॥१५॥ असम्बाधावृत्तम् ज्याप्ताकाशा वृष्टि मलिकुलरुतोद्गीता पौष्पी देवाहरवां प्रतिभुवनगृहस्यामात् । मुम्चन्त्येते दुन्दुमिमधुररदैः साई प्राथजीमूतान् स्तनितमुखरिताजिस्वा ॥१५॥ अपराजितावृत्तम् स्वदमरपटहैविशम्य धनागमं पटुजकदघटानिख्खनोङ्गणम् । विरचितरुचिमत्कलापसुमन्थरी मदकलमधुना रुवन्ति "शिलावलाः ॥१५२॥ गया छत्रत्रयं अपनी कान्तिसे शरदऋतुके चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हो रहा है ।।१४८।। हे भगवन् , जिसका स्कन्ध मरकतमणियोंसे अतिशय देदीप्यमान हो रहा है और जिसपर मधुर शब्द करते हुए भ्रमरोंके समूह बैठे हैं ऐसा यह शोभायमान तथा वायुसे हिलता हुआ आपका अशोकवृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो अपनी अत्यन्त देदीप्यमान शाखाओंको भुजा बनाकर उनके द्वारा स्पष्ट नृत्य ही कर रहा हो ॥१४९॥ अथवा अत्यन्त सुकोमल वायसे धीरे-धीरे हिलता हआ यह अशोकवृक्ष आपके ही समान सशोभित हो रहा है क्योंकि जिस प्रकार आप देवोंके द्वारा बरसाये हुए पुष्पोंसे आकीर्ण अर्थात् व्याप्त हैं उसी प्रकार यह अशोकवृक्ष भी पुष्पोंसे आकीर्ण है, जिस प्रकार मनुष्य देव और बड़े-बड़े मुनिराज आपको चाहते हैं-आपकी प्रशंसा करते हैं उसी प्रकार मनुष्य देव और बड़े-बड़े मुनिराज इस अशोकवृक्षको भी चाहते हैं, जिस प्रकार पवनकुमार देव मन्द-मन्द वाय चलाकर आपकी सेवा करते हैं उसी प्रकार इस वृक्षकी भी सेवा करते हैं यह मन्द-मन्द वायुसे हिल रहा है, जिस प्रकार आप सच्छाय अर्थात् उत्तम कान्तिके धारक हैं उसी प्रकार यह वृक्ष भी सच्छाय अर्थात् छोहरीका धारक है-इसकी छाया बहुत ही उन्तम है, जिस प्रकार आप मनुष्य तथा देवोंका शोक नष्ट करते हैं उसी प्रकार यह वृक्ष भी मनुष्य तथा देवोंका शोक नष्ट करता है और जिस प्रकार आप तीनों लोकोंके श्रेय अर्थात् कल्याणरूप है उसी प्रकार यह वृक्ष भी तीनों लोकोंमें श्रेय अर्थात् मंगल रूप है ॥१५०।। हे भगवन्, ये देव लोग, वर्षाकालके मेघोंकी गरजनाके शब्दोंको जीतनेवाले दुन्दुभि बाजोंके मधुर शब्दोंके साथ-साथ जिसने समस्त आकाशको व्याप्त कर लिया है और जो भ्रमरोंको मधुर गुंजारसे गाती हुई-सी जान पड़ती हैं ऐसी फूलोंकी वर्षा आपके सामने लोकरूपी घरके अप्रभागसे छोड़ रहे हैं ॥१५१।। हे भगवन्, आपके देव-दुन्दुभियोंके कारण बड़े-बड़े मेघोंकी घटाओंसे आकाशरूपी आँगनको रोकनेवाली वर्षाऋतुकी शंका कर ये मयूर इस समय अपनी सुन्दर पूँछ फैलाकर मन्द-मन्द १. नटनम् । २. भ्रमरपंक्तिः । ३. पवनोधूतः ल०, इ० । ४. नृशुक् नरशोकः । विहितनसुराशोको ल०, ६०, अ०, स० । ५. श्रयणीयः । ६. मलिकल ल०,०1७. मेघरववाचालितान् । ८. बर्हमन्द्रगमनाः । ९. ध्वनन्ति । १०. मयूराः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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