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________________ ५४६ भादिपुराणम् जितेन्द्रमासे वितुमागतेयं दिवापगा स्मादिति तळमाणा । पक्तिर्विरेजे शुचिचामराणां यौः सलील परिवीजितानाम् ॥५०॥ जैनी किमयुतिहदवन्ती' किमिन्दुमासा ततिरापतन्ती । इति स्म शव तनुने पतन्ती सा चामराली शरदिन्दुःशुभा ॥५१ सुधामलाङ्गी रुचिरा विरेजेसा चामराणां ततिल्लसन्ती। भोरोदफेनावलीरुग्वलन्ती मरुद्विभूतेव 'समिडकान्तिः ॥५२॥ लक्ष्मी परामाप परा पतन्ती समापीयूषसमानकान्तिः । --- "सिषेविषुस्तं जिनमानजन्ती पयोधिवेव सुचामराकी ॥५३॥ उपेन्द्रकमावृतम् - पतन्ति हंसाः किमु मेघमार्गात् किमुत्पतन्तीश्वरतो यासि । विशक्यमानानि सुरैरितीशः पेतुः समन्तात् सितचामराणि ॥५४॥ , उपजातिः यक्षरुदक्षिप्यत चामराली दक्षैः सलील कमलापताः । न्यक्षेपि मर्तु वितता बलक्षा' तरङ्गमालेव मरुबिरब्धः ॥५५॥ जितेन्द्रभक्त्या सुरनिम्नगेव "तयाजमेत्याम्बरतः पतन्ती । सा निर्वभौ चामरपक्तिहग्यास्नेव भन्योरुकुमदतीनाम् ॥५६॥ यझोंके द्वारा लीलापूर्वक चारों ओर दुराये जानेवाले निर्मल चमरोंकी वह पक्ति बड़ी ही सुशोभित हो रही थी और लोग उसे देखकर ऐसा तर्क किया करते थे मानो यह आकाशगङ्गा ही भगवानकी सेवाके लिए आयी हो ॥५०॥ शरऋतुके चन्द्रमाके समान सफेद पड़ती हुई वह चमरोंकी पंक्ति ऐसी आशंका उत्पन्न कर रही थी कि क्या यह भगवानके शरीरकी कान्ति ही ऊपरको जा रही है अथवा चन्द्रमाकी किरणोंका समूह ही नीचेकी ओर पड़ रहा है ॥५१॥ अमृत के समान निर्मल शरीरको धारण करनेवाली और अतिशय देदीप्यमान वह दुरती हुई चमरोंकी पंक्ति ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो वायुसे कम्पित तथा देदीप्यमान कान्तिको धारण करनेवाली हिलती हुई और समुद्रके फेनकी पंक्ति ही हो ॥१२॥ चन्द्रमा और अमृतके समान कान्तिवाली ऊपरसे पड़ती हुई वह उत्तम चमरोंकी पक्ति बड़ी उत्कृष्ट शोभाको प्राप्त हो रही थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो जिनेन्द्र भगवान्की सेवा करनेकी इच्छासे आती हुई क्षीर-समुद्रकी वेलाही हो ॥५॥ क्या ये आकाशसे हंस उतर रहे हैं अथवा भगवान्का यश ही ऊपरको जा रहा है इस प्रकार देवोंके द्वारा शंका किये जानेवाले वे सफेद चमर भगवान्के चारों ओर दुराये जा रहे थे ।।१४।। .. जिस प्रकार वायु समुद्रके आगे अनेक लहरोंके समूह उठाता रहता है उसी प्रकार कमलके समान दीर्घ नेत्रोंको धारण करनेवाले चतुर यक्ष भगवानके आगे लीलापूर्वक विस्तृत र सफेद चमरोंके समूह उठा रहे थे अर्थात् ऊपरकी ओर ढोर रहे थे ।।५५।। अथवा वह ऊँची चमरोंकी पंक्ति ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थी मानो उन चमरोंका बहाना प्राप्त कर जिनेन्द्र भगवान्को भक्तिवश आकाशगंगा ही आकाशसे उतर रही हो अथवा भन्य जीवरूपी कुमुदिनियोंको विकसित करनेके लिए चाँदनी ही नीचेकी ओर आ रही हो ॥१६॥ १. उद्गच्छन्ती। २. मयूखानाम् । ३. आ समन्तात् पतन्ती। ४. समृद्ध। ५. सेवितुमिच्छुः । ६. आगच्छन्ती। ७. प्रभोः। ८. प्रभोपरि। ९. धवला। 'वलक्षो धवलोऽर्जुनः' इत्यभिधानात् । १०. चामरव्याज।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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