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________________ ५४७ त्रयोविंशं पर्व इत्यात्ततोषैः स्फुरदक्षयोः प्रवीज्यमानानि शशाङ्कमासि। रेजुर्जगनाथगुणोरकरैर्वा स्पर्धा वितन्वन्स्यधिचामराणि ॥५७॥ लसत्सुधारशिविनिर्मलानि तान्यप्र मेयद्युतिकान्तिमानि । विभोर्जगत्प्रामवमद्वितीयं शशंसुरुच्चैश्चमरीरुहाणि ।।५८॥ लक्ष्मीसमालिजितवक्षसोऽस्य श्रीवृक्षचिहं दधतो जिनेशः । प्रकीर्णकानाममितधुतीनां धीन्द्राश्चतुःषष्टिमुदाहरन्ति ॥५५॥ जिनेश्वराणामिति चामराणि प्रकीर्तितानीह सनातनानाम् । अर्धार्धमानानि भवन्ति तानि चक्रेश्वराद् यावदसौ सुराजा ।।६०॥ - तोटकवृत्तम् सुरदुन्दुभयो मधुर वनयो निनदन्ति सदा स्म नमोविवरे । जलदागमशक्तिमिरुन्मदिमि : शिखिभिः परिवीक्षितपद्धतयः ॥६॥ पणवस्तुणवैः कलमन्द्ररुतैः सहकाहलशङ्खमहापटहैः । ध्वनिरुत्ससृजे ककुमां विवरं मुखरं विदधत् पिदधरच नमः ॥६२॥ धनकोणहताः सुरपाणविकैः कुपिता इव ते घुसदा पटहाः । ध्वनिमुत्समजुः किमहो वठराः परिताडयथेति' विसृष्टगिरः ॥६३॥ इस प्रकार जिन्हें अतिशय संतोष प्राप्त हो रहा है और जिनके नेत्र प्रकाशमान हो रहे हैं ऐसे यक्षोंके द्वारा दुराये जानेवाले वे चन्द्रमाके समान उज्ज्वलं कान्तिके धारक चमर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भगवान्के गुणसमूहोंके साथ स्पर्धा ही कर रहे हों ॥५७।। शोभायमान अमृतकी राशिके समान निर्मल और अपरिमित तेज तथा कान्तिको धारण करनेवाले वे चमर भगवान् वृषभदेवके अद्वितीय जगत्के प्रभुत्वको सूचित कर रहे थे ।।५८। जिनका थल लक्ष्मीसे आलिंगित है और जो श्रीवृक्षका चिह्न धारण करते हैं ऐसे श्रीजिनेन्द्रदेवके अपरिमित तेजको धारण करनेवाले उन चमरोंकी संख्या विद्वान् लोग चौसठ बतलाते हैं।५९|| इस प्रकार सनातन भगवान् जिनेन्द्रदेवके चौसठ चमर कहे गये हैं और वे ही चमर चक्रवर्तीसे लेकर राजा पर्यन्त बाधे-आधे होते हैं अर्थात् चक्रवर्तीके बत्तीस, अर्धचक्रीके सोलह, मण्डलेश्वरके आठ, अर्धमण्डलेश्वरके चार, महाराजके दो और राजाके एक चमर होता है॥६०।। इसी प्रकार उस समय वर्षाऋतुको शंका करते हुए मदोन्मत्त मयूर जिनका मागे बड़े प्रेमसे देख रहे थे ऐसे देवोंके दुन्दुभी मधुर शब्द करते हुए आकाशमें बज रहे थे ।।६१।। जिनका शब्द अत्यन्त मधुर और गम्भीर था ऐसे पणव, तुणव, काहल, शंख और नगाड़े आदि बाजे समस्त दिशाओंके मध्यभागको शब्दायमान करते हुए तथा आकाशको आच्छादित करते हुए शब्द कर रहे थे ॥६२॥ देवरूप शिल्पियोंके द्वारा मजबूत दण्डोंसे ताड़ित हुए वे देवोंके नगाड़े जो शब्द कर रहे थे उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कुपित होकर स्पष्ट शब्दोंमें १. स्फुरितेन्द्रिय । २. शशाङ्कस्य भा इव भा येषां ते । ३. अधिकचामराणि । ४. जिनेश्वरस्य । ५. गणघरादयः । विज्ञाः ल०, इ०, म०। ६. ब्रुवन्ति । ७. चक्रेश्वरादारभ्य असो सुराजा यावत् अयं श्रेणिको यावत श्रेणिकपर्यन्तमर्धादर्षाणि भवन्तीत्यर्थः। ८. पणववादनशीलैः। ९. त्यक्तवन्तः। १०. स्थलाः । ११. ताडनं कुरुथ ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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