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________________ त्रयोविंश पर्व - इन्द्रवज्रावृत्तम् रस्नैरनेकैः खचितं पराध्यैरुपदिनेशश्रियमाहसद्भिः । छत्रत्रयं तदुरुचेऽतिवीधं चन्द्रार्कसंपर्कविनिर्मितं वा ॥४४॥ सन्मौक्तिकं वार्दिजलायमानं सश्रीकमिन्दुयुतिहारि हारि । छत्रत्रयं तल्लसदिन्द्रवनं' दधे परां कान्तिमुपेत्य नाथम् ॥४५॥ वंशस्थवृत्तम् किमेष हासस्तनुते जगछियाः किमु प्रमोहल्लसितो यशोगणः । उत स्मयों धर्मनृपस्य निर्मलो जगस्त्रयानन्दकरो नु चन्द्रमाः ॥४६॥ इति प्रतकं जनतामनस्वदो वितन्वदिद्धा तपवारणत्रयम् । बमौ विभोर्मोहविनिर्जयार्जितं यशोमयं बिम्वमिव विधास्थितम् ॥४७॥ उपेन्द्रवज्रावृत्तम् पयः पयोधेरिव वीचिमाला प्रकीर्णकानां समितिः समन्तात् । जिनेन्द्रपर्यन्तनिषेविपक्षकरोत्करैराविरभूद् विधूता ॥४८॥ उपजातिवृत्तम् पीयूष शल्कैरिव निर्मिताङ्गी चान्द्ररिवर्घिटिताऽमलश्रीः । जिनानिार्यन्तमुपेत्य भेजे प्रकीर्णकाली गिरिनिझरामाम् ॥४९ वह छत्रत्रय उदय होते हुए सूर्यकी शोभाकी हँसी उड़ानेवाले अनेक उत्तम-उत्तम रत्नोंसे जड़ा हुआ था तथा अतिशय निर्मल था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो चन्द्रमा और सूर्यके सम्पर्क (मेल) से ही बना हो ॥४४॥ जिसमें अनेक उत्तम मोतो लगे हुए थे, जो समुद्रके जलके समान जान पड़ता था, बहुत ही सुशोभित था, चन्द्रमाकी कान्तिको हरण करनेवाला था, मनोहर था और जिसमें इन्द्रनील मणि भी देदीप्यमान हो रहे थे ऐसा वह छत्रत्रय भगवान्के समीप आकर उत्कृष्ट कान्तिको धारण कर रहा था ॥४५॥ क्या यह जगतरूपी लक्ष्मीका हास फैल रहा है ? अथवा भगवान्का शोभायमान यशरूपी गुण है ? अथवा धर्मरूपी राजाका मन्द हास्य है ? अथवा तीनों लोकोंमें आनन्द करनेवाला कलंकरहित चन्द्रमा है, इस प्रकार लोगोंके मनमें तर्क-वितर्क उत्पन्न करता हुआ वह देदीप्यमान छत्रत्रय ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मोहरूपी शत्रुको जीत लेनेसे इकट्ठा हुआ तथा तीन रूप धारण कर ठहरा हुआ भगवान्के यशका मण्डल ही हो ॥४६-४७॥ जिनेन्द्र भगवान्के समीपमें सेवा करनेवाले यक्षोंके हाथोंके समूहोंसे जो चारों ओर चमरोंके समूह दुराये जा रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो क्षीरसागरके जलके समूह ही हों ॥४८॥ अत्यन्त निर्मल लक्ष्मीको धारण करनेवाला वह चमरोंका समूह ऐसा जान पड़ता था मानो अमृतके टुकड़ोंसे ही बना हो अथवा चन्द्रमाके अंशोंसे हो रचा गया होतथा वही चमरोंके समूह भगवान्के चरणकमलोंके समीप पहुँचकर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो किसी पर्वतसे झरते हुए निर्झर ही हों ।।४।। १. नितरां धवलम् । २. प्रशस्तमौक्तिकत्वादिति हेतभितमिदम् । ३. विलसदिन्द्रनीलमाणिक्यवज्रो यस्य । ४. हासः। ५. दीप्त। ६. चामराणाम् । ७. खण्डः । ८. चन्द्रसम्बन्धिभिः । ९. भेजे द०। १०.-निर्झराभा ६०, ल०, इ० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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