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________________ ५३८ आदिपुराणम् अष्टदग्डोच्छ्रिता शेया जगती पीठमादिमम् । द्वितीयं च तदर्धे मितोच्छार्य विदुर्वधाः ॥३०॥ तावदुच्छितमन्स्यं च पीठ सिंहासनोचतिः । धनुरेकमिहाम्नातं धर्मचक्रस्य चोच्छितिः ॥३१॥ इत्युक्तेन विमागेन जिनस्यास्थायिका स्थिता । तन्मध्ये 'तदवस्थानमितः शृणुत मन्मुखात् ॥३१२॥ शार्दूलविक्रीडितम इत्युचर्गणनायके निगदति व्यक्तं जिनास्थायिकां प्रध्यक्तैर्मधुरैर्वचोमिलचितैस्तत्वार्थसंबोधिमिः । बुद्धान्ताकरणो विकासि वदनं बभ्रे नृपः श्रेणिकः प्रोतः प्रातरिवाजिनीवनचयः प्रोन्मीलितं पाजम् ॥३३॥ 'सभ्याः सभ्यतमामसम्यं कुमतध्वान्तच्छिदं भारती तः श्रीगौतमस्वामिनः। साई योगिभिरागमन् जिनपती प्रीति स्फुरवलोचनाः प्रोत्फुल्लाः कमलाकरा इव रखेरासाथ दीक्षिश्रियम् ॥३३॥ ___ मालिनीच्छन्दः स जयति जिननायो यस्य कैवल्यपूर्जा "विततनिषुरुवप्राममुतश्रीमहन्दः । थीं। उन दोवालोंकी ऊँचाईका वर्णन पहले कर चुके हैं-तीर्थकरोंके शरीरकी ऊँचाईसे बारहगुनी ॥३०९॥ प्रथम पीठरूप जगती आठ धनुष ऊँची जाननी चाहिए और विद्वान् लोग द्वितीय पीठको उससे आधा अर्थात् चार धनुष ऊँचा जानते हैं ॥३१०॥ इसी प्रकार तीसरा पीठ भी चार धनुष ऊँचा था, तथा सिंहासन और धर्मचक्रकी ऊँचाई एक धनुष मानी गयी है।॥३१॥ इस प्रकार ऊपर कहे अनुसार जिनेन्द्र भगवानकी समवसरण सभा बनी हुई थी। अब उसके बीचमें जो जिनेन्द्र भगवान्के विराजमान होनेका स्थान अर्थात् गन्धकुटी बनी हुई थी उसका वर्णन भी मेरे मुखसे सुनो ॥३१२॥ इस प्रकार जब गणनायक गौतम स्वामीने अतिशय स्पष्ट, मधुर, योग्य और तत्स्वार्थके स्वरूपका बोध करानेवाले वचनोंसे जिनेन्द्र भगवानको समवसरण-सभाका वर्णन किया तब जिस प्रकार प्रातःकालके समय कमलिनियोंका समूह प्रफुल्लित कमलोंको धारण करता है उसी प्रकार जिसका अन्तःकरण प्रबोधको प्राप्त हुआ है ऐसे श्रेणिक राजाने अपने प्रफुल्लित मुखको धारण किया था अर्थात् गौतम स्वामीके वचन सुनकर राजा श्रेणिकका मुखरूपी कमल हर्षसे प्रफुल्लित हो गया था ॥३१३॥ मिथ्यादृष्टियोंके मिध्यामतरूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाली, अतिशय योग्य और वचनसम्बन्धी दोषोंसे रहित गणधर गौतम स्वामीकी उस वाणीको सुनकर सभामें बैठे हुए सब लोग मुनियोंके साथ-साथ जिनेन्द्र भगवान्में परम प्रीतिको प्राप्त हुए थे, उस समय उन सभी सभासदोंके नेत्र हर्षसे प्रफुल्लित हो रहे थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्यको किरणरूपी लक्ष्मीका आश्रय पाकर फूले हुए कमलोंके समूह ही हों ॥३१४॥ जिनके केवलज्ञानकी उत्तम पूजा करनेका अभिलाषी तथा अद्भुत् विभूतिको १. प्रथमपीठरूपा जगती। २. चतुर्दण्डेन । ३. जिनस्यावस्थानम् । ४. इतः परम् । ५. प्रबुद्ध । १. सभायोग्याः । ७. प्रशस्ततमाम् । ८. असतां मिथ्यादृशां कुमत । ९. अपगतवचनदोषाम् । १०.मा समन्तात् प्राप्तवन्तः । ११. वितनितुमिच्छुः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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