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________________ द्वाविंशं पर्व अधरीकृतनिःशेषभवनं मासुरचति । जिनस्येव वपुर्माति यत् स्म देवासुरार्चितम् ॥३०२॥ ज्योति गणपरीतस्वात् सर्वोत्तर तयापि तत् । न्यचकार श्रियं मेरोधारणाञ्च जगद्गुरोः ॥३०३॥ ईत्रिमेखल पीठमस्योपरि जिनाधिपः । त्रिलोकशिखरे सिद्धपरमेष्ठीव निर्बभौ ॥३०॥ नमा स्फटिकसालस्य मध्यं योजनसम्मितम् । "वनत्रयस्य रुन्द्रत्वं वजरुहावनेरपि ॥३०५॥ प्रत्यकं योजनं ज्ञेयं धूलोसालाच्च खातिका । गस्वा योजनमेकं स्याज्जिनदेशितविस्तृतिः ॥३०६॥ नमःस्फटिकसालातु स्यादाराद् वनवेदिका । योजना तृतीयाञ्च सालात् पोठं तदर्धगम् ॥३०७॥ कोशाध पीठमूर्ध्नः स्याद् विष्कम्मो मेखलेऽपरे। प्रत्येकं धनुषा रुन्द्रे स्यातामर्धाष्टमं शतम्॥३०॥ क्रोश रुन्द्रा महावीथ्यो मित्तयः स्वोच्छितेर्मिताः। रौन्द्रयणाष्टममागेन"पानिर्णीता तदुच्छितिः ॥३०९। थी जिससे वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सुवर्णके ही बने हों ॥३०१॥ जिसने समस्त लोकको नीचा कर दिया है, जिसकी कान्ति अतिशय देदीप्यमान है और जो देव तथा धरणेन्द्रोंके द्वारा पूजित है ऐसा वह पीठ जिनेन्द्र भगवानके शरीरके समान सुशोभित हो रहा था क्योंकि जिनेन्द्र भगवान्के शरीरने भी समस्त लोकोंको नीचा कर दिया या, उसकी कान्ति भी अतिशय देदीप्यमान थी, और यह भी देव तथा धरणेन्द्रोंके द्वारा पूजित था।॥३०२।। अथवा वह पीठ सुमेरु पर्वतको शोभा धारण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार सुमेरु पर्वत ज्योतिर्गण अर्थात् ज्योतिषी देवोंके समूहसे घिरा हुआ है उसी प्रकार वह पीठ भी ज्योतिर्गण अर्थात् किरणोंके समूहसे घिरा हुआ था, जिस प्रकार सुमेरुपर्वत सर्वोत्तर अर्थात् सब क्षेत्रोंसे उत्तर दिशामें हैं उसी प्रकार वह पीठ भी सर्वोत्तर अर्थात् सबसे उत्कृष्ट था, और जिस प्रकार सुमेरु पर्वत (जन्माभिषेकके समय) जगद्गुरु जिनेन्द्र भगवानको धारण करता है उसी प्रकार वह पीठ भी ( समवसरण भूमिमें ) जिनेन्द्र भगवानको धारण कर रहा था ॥३०३।। इस प्रकार तीन कटनीदार वह पीठ था, उसके ऊपर विराजमान हुए जिनेन्द्र भगवान् ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि तीन लोकके शिखरपर विराजमान हुए सिद्ध परमेष्ठी सुशोभित होते हैं ॥३०॥ आकाशके समान स्वच्छ स्फटिकमणियोंसे बने हुए तीसरे कोटके भीतरका विस्तार एक योजन प्रमाण था, इसी प्रकार तीनों वन (लतावन, अशोक आदिके वन और कल्पवृक्ष वन) तथा ध्वजाओंसे रुकी हुई भूमिका विस्तार भी एक-एक योजन प्रमाण था और परिखा मी धूलीसालसे एक योजन चल कर थी, यह सब विस्तार जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ है ॥३०५-३०६॥ आकाशस्फटिकमणियोंसे बने हुए कोटसे कल्पवृक्षोंके वनकी वेदिका आधा योजन दूर थी और उसी सालसे प्रथमपीठ पाव योजन दूरीपर था ॥३०७॥ पहले पीठके मस्तकका विस्तार आधे कोशका था, इसी प्रकार दूसरे और तीसरे पीठकी मेखलाएँ भी प्रत्येक साढ़ेसात सौ धनुष चौड़ी थी॥३०॥ महावीथियों अर्थात् गोपुर-द्वारोंके सामनेके बड़ेबड़े रास्ते एक-एक कोश चौड़े थे और सोलह दीवालें अपनी ऊँचाईसे आठवें भाग चौड़ी १.तेजोराशि, पक्षे ज्योतिष्कसमूहः । २. सर्वोत्कृष्टतया, पक्षे सर्वोत्तरदिक्स्थतया। ३. अध:करोति स्म। ४, आकाशस्फटिकसालवलयाभ्यन्तरवर्तिप्रदेशः। पीठसहितः सर्वोऽप्येकयोजनमित्यर्थः । ५. वल्लीवनाशोकायुपवनकल्पवृक्षवनमिति वनत्रयस्य । ६. ध्वजभूमेरपि प्रत्येकमेकयोजनप्रमारुन्द्रं स्यात् । ७. धूलोसाला.. दारभ्य खातिकापर्यन्तमेकयोजनमित्यर्थः । ८. पश्चाद्भागे। पुनराकाशस्फटिकशालादन्तः । ९. तद्योजनस्याटुक्रोशं गत्वा प्रथमपीठं भवतीति भावः। १०. दण्डसहस्रम् । ११. तृतीयपीठस्य। १२. विशालः । १३. प्रथमद्वितीयमेखले। १४. पञ्चाशदधिकसप्तशतम्, चापप्रमितरुन्द्रे स्याताम् । १५. सिद्धार्थचैत्यवक्षादिना निश्चिता । १६. तदभित्तीनामुन्नतिः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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