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________________ ५०७ द्वाविंशं पर्व इति प्रमोदमातन्वमकस्माद् भुवनोदरे । केवलज्ञानपूर्णेन्दुर्जगदब्धिमवीवृधत् ॥१०॥ चिकैरमीभिरताय सुरेन्द्रोऽबोधि सावधिः । वैभवं भुवनम्यापि वै मवध्वंसिबैमवम् ॥1॥ अथोत्यायासनादाशु प्रमोदं परमुद्वहन् । तनादिव नम्रोऽभूनतमूर्धा शचीपतिः ॥१२॥ किमेतदिति पृच्छन्ती पौलोमोमतिसंभ्रमात् । हरिः प्रबोधयामास विमोः कैवल्यसंभवम् ॥१३॥ प्रयाणपटहेपूच्चैः प्रध्वनस्सु शताध्वरः । भर्तुः कैवल्यपूजायै निश्चक्राम सुरैर्वृतः ॥१४॥ ततो बलाहकाकार विमानं कामगाह्वयम् । चक्रे बलाहको देवो जम्बूद्वीपप्रमान्वितम् ॥१५॥ मुक्तालम्बनसंशोभितदामाद् रत्ननिर्मितम् । तोषाग्रहासमातन्वदिव ''किद्धिणिकास्वनैः ॥१६॥ शारदाभ्रमिवाददं" श्वेतिताखिलदिन्मुखम् । "नागदत्ताभियोग्येशो"नागमैरावतं म्यधात् ॥१७॥ ततस्तद्विक्रियारब्धमारूढो दिव्यवाहनम् । हरिवाहः सहशानः प्रतस्थे सपुलोमजः ॥१८॥ इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदामराः । सारमरक्षजगत्पालाः सानीकाः सप्रकीर्णकाः ॥१९॥ कर दिया है ऐसी ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही थी ।।९।। इस प्रकार संसारके भीतर अकस्मात् आनन्दको विस्तृत करता हुआ केवलज्ञानरूपी पूर्ण चन्द्रमा संसाररूपी समुद्रको बढ़ा रहा था अर्थात् आनन्दित कर रहा था ॥१०॥ अवधिज्ञानी इन्द्रने इन सब चिह्नोंसे संसारमें व्याप्त हुए और संसारको नष्ट करनेवाले, भगवान् वृषभदेवके केवलज्ञानरूपी वैभवको शीघ्र ही जान लिया था। ॥११॥ तदनन्तर परमे आनन्दको धारण करता हुआ इन्द्र शीघ्र ही आसनसे उठा और उस आनन्दके भारसे ही मानो नतमस्तक होकर उसने भगवान के लिए नमस्कार किया था ॥१२॥ 'यह क्या है' इस प्रकार बड़े आश्चर्यसे पूछती हुई इन्द्राणीके लिए भी इन्द्रने भगवान्के केवलज्ञानकी उत्पत्तिका समाचार बतलाया था ॥१३॥ अथानन्तर जब प्रस्थानकालकी सूचना देनेवाले नगाड़े जोर-जोरसे शब्द कर रहे थे तब इन्द्र अनेक देवोंसे परिवृत होकर भगवान्के केवलज्ञानकी पूजा करनेके लिए निकला ॥१४॥ उसी समय बलाहकदेवने एक कामगनामका विमान बनाया जिसका आकार बलाहक अर्थात् मेघके समान था और जो जम्बूद्वीपके प्रमाण था॥१५।। वह विमान रत्नोंका बना हुआ था और मोतियोंकी लटकती हुई मालाओंसे सुशोभित हो रहा था तथा उसपर जो किंकिणियाँके शब्द हो रहे थे उनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो सन्तोषसे हँस ही रहा हो ॥१६॥ जो आभियोग्य जातिके देवोंमें मुख्य था ऐसे नागदत्त नामके देवने विक्रिया ऋद्धिसे एक ऐरावत हाथी बनाया। वह हाथी शरद्ऋतुके वादलोंके समान सफेद था, बहुत बड़ा था और उसने अपनी सफेदीसे समस्त दिशाओंको सफेद कर दिया था॥१७॥ तदनन्तर सौधर्मेन्द्रने अपनी इन्द्राणी और ऐशान इन्द्रके साथ-साथ विक्रिया ऋद्धिसे बने हुए उस दिव्यवाहनपर आरूढ़ होकर प्रस्थान किया ॥१८॥ सबसे आगे किल्विषिक जातिके देव जोर-जोरसे सुन्दर नगाड़ोंके शब्द करते जाते थे और उनके पीछे इन्द्र, सामाजिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक और १. वर्धयति स्म । २. सपदि । ३. विगतो भवः विभवः विमवे भवं वैभवम् । संसारच्युतो जातमिति यावत् । ४. स्फुटम् । ५. पुरुपरमेश्वरवैभवम् । ६. शचीम् । ७. निर्गच्छति स्म । ८. मेघाकारम् । ९. कामकाह्वयम् ल०, म०, इ० । कामुकाह्वयम् द०। १०. वलाहकनामा। ११. प्रमाणान्वितम् । १२. तदभावात् ल०, म०, ८०, इ०, अ०, ब०, स० । १३. क्षुद्रघण्टिका। १४. पृथुलम् । १५. वाहनदेवमुख्यः । १६. गजम् । १७. इन्द्रः । १८. इन्द्राणीसहितः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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