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________________ आदिपुराणम् तदपा यप्रतीकारचित्रोपायानुचिन्तनम् । अत्रैवान्तर्गतं ध्ये यमनुप्रेक्षादिलक्षणम् ॥१४२॥ शुभाशुभविभक्तानां कर्मणां परिपाकतः । भवावर्तस्य वैचित्र्यममि संदधतो मुनेः ॥१४३॥ . विपाकविचयं धर्म्यमामनन्ति कृता गमाः । विपाकश्च द्विधाम्नातः कर्मणामाप्तसूतिषु ॥१४४॥ यथाकालमुपायाच्च फलप तिर्वनस्पतेः । यथा तथैव कर्मापि फलं दत्ते शुभाशुभम् ॥१५॥ मूलोत्तरप्रकृत्यादिबन्धस वायुपाश्रयः । कर्मणामुदयश्चित्रः प्राप्य ''द्रव्यादिसनिधिम् ॥१४६॥ "यतश्च तद्विपाकज्ञस्तदपायाय' चेष्टते । "ततो ध्येयमिदं ध्यानं मुक्त्युपायो मुमुक्षुमिः ॥१४७॥ संस्थानविचयं प्राहुलोंकाकारानुचिन्तनम् । तदन्तर्भूतजीवादितत्त्वान् वीक्षणलक्षितम् ॥१८॥ द्वीपाब्धिवलयानद्रीन् सरितश्च सरांसि च । विमानमवनव्यस्तरावासनरकक्षितीः ॥१४९॥ त्रिजगत्सन्निवेशेन सममेतान्यथागमम् । मावान् मुनिरनुध्यायेत् संस्थानविचयोपगः ॥१५०॥ जीवभेदांश्च तत्रत्यान् ध्यायेन्मुक्तेतरात्मकान् । ज्ञस्वकर्तृ स्वमोक्तृत्वद्रष्टत्वादींश्च"तद्गुणान् ॥१५॥ वाचनिक, कायिक अथवा जन्म-जरा-मरणसे होनेवाले, तीन प्रकारके सन्तापोंसे भरा हुआ है। इसमें पड़े हुए जीव निरन्तर दुःख भोगते रहते हैं। उनके दुःखका बार-बार चिन्तवन करना सो अपायविचय नामका धर्म्यध्यान है ॥१४१॥ अथवा उन अपायों (दुःखों) के दूर करनेकी चिन्तासे उन्हें दूर करनेवाले अनेक उपायोंका चिन्तवन करना भी अपायविचय कहलाता है। बारह अनुप्रेक्षा तथा दश धर्म आदिका चिन्तवन करना इसी अपायबिचय नामके-धर्म्यध्यानमें शामिल समझना चाहिए ॥१४२।। शुभ और अशुभ भेदोंमें विभक्त हुए कर्मोके उदयसे संसाररूपी आवर्तकी विचित्रताका चिन्तवन करनेवाले मुनिके जो ध्यान होता है उसे आगमके जाननेवाले गणधरादि देव विपाकविचय नामका धर्म्यध्यान मानते हैं। जैन शात्रोंमें कोका उदय दो प्रकारका माना गया है। जिस प्रकार किसी वृक्षके फल एक तो समय पाकर अपने आप पक जाते हैं और दूसरे किन्हीं कृत्रिम उपायोंसे पकाये जाते हैं उसी प्रकार कर्म भी अपने शुभ अथवा अशुभ फल देते हैं अर्थात् एक तो स्थिति पूर्ण होनेपर स्वयं फल देते हैं और दूसरेतपश्चरण आदिके द्वारा स्थिति पूर्ण होनेसे पहले ही अपना फल देने लगते हैं ॥१४३-१४५॥ मूल और उत्तर प्रकृतियोंके बन्ध तथा सत्ता आदिका आश्रय लेकर द्रव्य क्षेत्र काल भावके निमित्तसे कोका उदय अनेक प्रकारका होता है ॥१४६॥ क्योंकि ककि विपाक (उदय) को जाननेवाला मुनि उन्ह नष्ट करनेके लिए प्रयत्न करता है इसलिए मोक्षाभिलाषी मनियाँको मोक्षके उपायभूत इस विपाकविचय नामके धर्म्यध्यानका अवश्य ही चिन्तवन करना चाहिए ॥१४७॥ लोकके आकारका बार-बार चिन्तवन करना तथा लोकके अन्तर्गत रहनेवाले जीव अजीव आदि तत्त्वोंका विचार करना सो संस्थानबिचय नामका धर्म्यध्यान है ॥१४८॥ संस्थानविचय धर्म्यध्यानको प्राप्त हुआ मुनि तीनों लोकोंकी रचनाके साथ-साथ द्वीप, समुद्र, पर्वत, नदी, सरोवर, विमानवासी, भवनवासी तथा व्यन्तरोंके रहनेके स्थान और नरकोंकी भमियाँ आदि पदार्थोंका भी शास्त्रानुसार चिन्तवन करे ॥१४९-१५०॥ इसके सिवाय उस लोकमें रहनेवाले संसारी और मुक्त ऐसे दो प्रकार वाले जीवोंके भेदोंका जानना, कर्ता १. तापत्रयाद्यपायप्रतीकार । २. चिन्तो ल०, म०, ६०, अ०, ५०, स०। ३. शेयम् । ४. संजातस्य इति शेषः । ५. ध्यायतः । अपि ल०, म०। ६. संपूर्णागमाः। ७. परमागमेषु । ८. पाकः । ९. सत्ताधुपाइ० । १०. द्रव्यक्षेत्रकालभाव । ११. यस्मात् कारणात् । १२. कर्मणामुदयवित् पुमान् । १३. कर्मापायाय । १४. ततः कारणात् । १५. विचार । १६. लक्षणम् ल०, म०, इ०, अ०, स०। १७. संस्थानविचयशः । १८. तत्र त्रिजगति भवान् । १९. जोवगणान । यद्गुणान् ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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