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________________ एकविंशं पर्व 'तत्रानपेतं यद्धर्मात्तद्ध्यानं धर्म्यमिप्यते । धयों हि वस्तुयाथात्म्यमुत्पादादिश्यात्मकम् ॥१३३॥ तदाज्ञापायसंस्थानविपाकविचयात्मकम् । चनुर्विकल्पमाम्नातं ध्यानमाम्नाय वेदिमिः ॥१३४॥ तत्राज्ञेत्यागमः सूक्ष्मविषयः प्रणिगद्यते । दृश्यानुमेयवये हि श्रद्धेयांशे गतिः श्रुतेः ॥१३५॥ श्रुतिः सूनृतमाशाप्तवचो वेदाङ्गमागमः । आम्नायश्चेति पर्यायः सोऽधिगम्यो मनीषिभिः ॥१३६॥ अनादिनिधनं सूक्ष्मं सद्भूतार्थप्रकाशनम् । पुरुषार्थोपदेशित्वाद् यद्भुतहितमूर्जितम् ॥१३७॥ अजय्यममितं तीयेरनालीढमहोदयम् । महानुभावमर्थाव गावं गम्भीरशासनम् ॥१३८॥ परं प्रवचनं "सूक्तमाप्तोपज्ञमनन्यथा । मन्यमानो मुनिायेद मावानोज्ञाविमावितान् ॥१३९॥ जैनों प्रमाणयमाज्ञां योगी योगविदां वर । ध्यायेदर्मास्तिकायादीन् मावान् सूक्ष्मान् यथागमम् ।।१४०॥ आज्ञाविचय एष स्यादपायविचयः पुनः। तापत्रयादिजन्माब्धिगतापायविचिन्तनम् ॥१४॥ शुक्ल ध्यानके भेदसे दो प्रकारका होता है।।१३२।। उन दोनोमें-से जो ध्यान धर्मसे सहित होता है वह धर्म्यध्यान कहलाता है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों सहित जो वस्तुका यथार्थ स्वरूप है वही धर्म कहलाता है। भावार्थ-वस्तुके स्वभावको धर्म कहते हैं और जिस ध्यान में वस्तुके स्वभावका चिन्तवन किया जाता है उसे धम्यध्यान कहते हैं ॥१३३।। आगमकी परम्पराको जाननेवाले ऋषियोंने उस धर्म्यध्यानके आज्ञाविचय, अपायविचय, संस्थानविचय और विपाकविचय इस प्रकार चार भेद माने हैं ॥१३४।। उनमें से अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ को विषय करनेवाला जो आगम है उसे आज्ञा कहते हैं क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमानके विषयसे रहित केवल श्रद्धान करने योग्य पदार्थमें एक आगमकी ही गति होती है। भावार्थ-संसारमें कितने ही पदार्थ ऐसे हैं जो न तो प्रत्यक्षसे जाने जा सकते हैं और न अनुमानसे ही। ऐसे सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थोंका ज्ञान सिर्फ आगमके द्वारा ही होता है अर्थात् आप्त प्रणीत आगममें ऐसा लिखा है इसलिए ही वे माने जाते हैं । १३५ ।। श्रुत्ति, सूनृत, आज्ञा, आप्त वचन, बेदांग, आगम और आम्नाय इन पर्यायवाचक शब्दोंसे बुद्धिमान् पुरुष उस आगम को जानते हैं ॥१३६।। जो आदि और अन्तसे रहित है, सूक्ष्म है, यथार्थ अर्थको प्रकाशित करनेवाला है, जो मोक्षरूप पुरुषार्थका उपदेशक होनेके कारण संसारके समस्त जीवोंका हित करनेवाला है, युक्तियोंसे प्रबल है, जो किसीके द्वाराजीता नहीं जा सकता, जो अपरिमित है, परवादी लोग जिसके माहात्म्यको छू भी नहीं सकते हैं, जो अत्यन्त प्रभावशाली है, जीव अजीव आदि पदार्थोंसे भरा हुआ है, जिसका शासन अतिशय गंभीर है, जो परम उत्कृष्ट है, सूक्ष्म है और आप्तके द्वारा कहा हुआ है. ऐसे प्रवचन अर्थात् आगमकोसत्यार्थ रूप मानता हुआ मुनि आगममें कहे हुए पदार्थोंका ध्यान करे॥१३७१३९।। योगके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ योगी जिनेन भगवानकी आज्ञाको प्रमाण मानता हुआ धर्मास्तिकाय आदि सूक्ष्म पदार्थोंका आगममें कहे अनुसार ध्यान करे ॥१४वा इस प्रकारके ध्यान करनेको आज्ञाविचय नामका घHध्यान कहते हैं। अब आगे अपायविचय नामके धर्म्यध्यानका वर्णन किया जाता है। तीन प्रकारके संताप आदिसे भरे हुए संसाररूपी समुद्रमें जो प्राणी पड़े हुए हैं उनके अपायका चिन्तवन करना सो अपायबिचय नामका धर्म्यध्यान है। भावार्थ-यह संसाररूपी समुद्र मानसिक; १. ध्यानद्वये । २. उत्पादव्ययध्रौव्यस्वरूपम् । ३. परमागमवेदिभिः । ४. प्रत्यक्षानुमानरहिते । ५. अवगमनम् । ६. आगमस्य । ७. सत्यस्वरूप। ८. परवा दिभिः । ९. तलस्पर्शरहितम् । १०. आज्ञा । ११. सूक्ष्म प०, ल०, म०, द०, इ.। १२. विपरीताभावेन । १३. आगमेन ज्ञातान् । १४. जातिजरामरणरूप, अथवा रागद्वेषमोहरूप, अथवा आधिदैविकं देवमधिकृत्य प्रवृत्तम्, आधिभौतिक भूतग्रहमधिकृत्य प्रवृत्तम, आध्यात्मिकरूपम् आत्मानमधिकृत्य प्रवृत्तम् । ६२
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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