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________________ एकविंशं पर्व ४९१ तेषां स्वकृतकर्मानुभावोस्थमतिदुस्तरम् । भवाब्धि व्यसनावतं दोषयादः कुलाकुलम् ॥१५२॥ सज्ज्ञाननावा संतार्यमतायं प्रन्थिकात्ममिः । अपारमतिगम्भीरं ध्यायेदध्यात्मविद् यतिः ॥१५३॥ किमत्र बहुनोक्तेन सर्वोऽप्यागमविस्तरः । 'नयमङ्गशताकीणों ध्येयोऽध्यात्मविशुद्धये ॥१५॥ 'तदप्रमत्ततालम्बं स्थितिमान्तर्मुहूर्तिकीम् । दधानमप्रमत्तेषु परी कोटिमधिष्ठितम् ॥१५५॥ सद्दष्टिषु यथाम्नायं शेषेप्वपि कृतस्थिति । प्रकृष्टशुदिमल्लेश्मात्रयोपोबल वृंहितम् ॥१५६॥ क्षायोपशमिकं भावं स्वसास्कृत्य विज़म्भितम् । महोद महाप्रजमहर्षिमिरुपासितम् ॥१५॥ 'वस्तुधर्मानुयायित्वात् प्राप्तान्वर्थनिरुक्तिकम् । धयं ध्यानमनुध्येयं यथोक्तध्येयविस्तरम् ॥:५८॥ प्रसन्नचित्तता धर्मसंवेगः शुभयोगता"। सुश्रुतत्वं समाधानमाज्ञाधिगमजा" रुचिः ॥१५९॥ मवन्त्येतानि लिगानि धर्मस्यान्तर्गतानि । सानुप्रेक्षाश्च पूर्वोक्ता विविधाः शुभमावनाः ॥१६०॥ पना, भोक्तापना और दर्शन आदि जीवोंके गुणोंका भी ध्यान करे ॥१५१॥ अध्यात्मको जाननेवाला मुनि इस संसाररूपी समुद्रका भी ध्यान करे जो कि जीवोंके स्वयं किये हुए कर्मोंके माहात्म्यसे उत्पन्न हुआ है, अत्यन्त दुस्तर है, व्यसनरूपी भँवरोंसे भरा हुआ है, दोषरूपी जल-जन्तुओंसे व्याप्त है, सम्यग्ज्ञानरूपी नावसे तैरनेके योग्य है, परिग्रही साधु जिसे कभी नहीं तैर सकते, जिसका पार नहीं है और जो अतिशय गम्भीर है ॥१५२-१५३॥ अथवा इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? नयोंके सैकड़ों भंगोंसे भरा हुआ जो कुछ आगमका विस्तार है वह सब अन्तरात्माकी शुद्धिके लिए ध्यान करने योग्य है ॥१५४॥ यह धर्मध्यान अप्रमत्त अवस्थाका आलम्बन कर अन्तर्मुहूर्त तक स्थित रहता है और प्रमादरहित ( सप्तमगुणस्थानवर्ती ) जीवोंमें ही अतिशय उत्कृष्टताको प्राप्त होता है ॥१५५॥ इसके सिवाय अतिशय शुद्धिको धारण करनेवाला और पीत, पद्म तथा शुक्ल ऐसी तीन शुभ लेश्याओंके बलसे वृद्धिको प्राप्त हुआ यह धर्म्यध्यान शास्त्रानुसार सम्यग्दर्शनसे सहित चौथे गुणस्थानमें तथा शेषके पाँचवें और छठे गुणस्थानमें भी होता है। भावार्थ-इन गुणस्थानोंमें धर्म्यध्यान हीनाधिक भावसे रहता है । धर्म्यध्यान धारण करनेके लिए कमसे-कमसम्यग्दृष्टि अवश्य होना चाहिए क्योंकि सम्यग्दर्शनके बिना पदार्थोंके यथार्थस्वरूपका श्रद्धान और निर्णय नहीं होता। मन्दकषायी मिथ्यादृष्टि जीवोंके जो ध्यान होता है उसे शुभ भावना कहते हैं ॥१५६॥ यह धर्म्यध्यान क्षायोपशमिक भावोंको स्वाधीन कर बढ़ता है। इसका फल भी बहुत उत्तम होता है और अतिशय बुद्धिमान महर्षि लोग भी इसे धारण करते हैं ॥१५७॥ वस्तुओंके धर्मका अनुयायी होनेके कारण जिसे धर्म्यध्यान ऐसा सार्थक नाम प्राप्त हुआ है और जिसमें ध्यान करने योग्य पदार्थोंका ऊपर विस्तारसे वर्णन किया जा चुका है ऐसे इस धर्म्यध्यानका बारबार चिन्तवन करना चाहिए ॥१५८॥ प्रसन्नचित्त रहना, धमसे प्रम करना, शुभ योग रखना, उत्तम शास्त्रोंका अभ्यास करना, चित्त स्थिर रखना और आज्ञा (शास्त्रका कथन ) तथा स्वकीय ज्ञानसे एक प्रकारको विशेष रुचि (प्रीति अथवा श्रद्धा ) उत्पन्न होना ये धर्मध्यानके बाह्य चिह्न हैं और अनुप्रेक्षाएँ तथा पहले कही हुई अनेक प्रकारकी शुभ भावनाएँ उसके १. जलजन्तुसमूहः। २. परिग्रहवद्भिः । ३. नयभेद-। ४. धर्म्यध्यानम् । ५. परमप्रकर्षम् । ६. असंयतदेशसंयतप्रमत्तेषु । ७. सहायविजृम्भितम् । ८. महाप्राज- ल०, म०, ८०, इ०, प० । ९. वस्तुयथास्वरूप। १०. शुभपरिणाम । ११. आज्ञा नान्यथावादिनो जिना इति श्रद्धानम् । अधिगमः प्रवचनपरिज्ञानम् ताभ्यां जाता रुचिः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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