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________________ विशं पर्व इति तद्वचनात् प्रीतौ तौ तस्संकथवा स्थिती । यावत्तावच्च योगीन्द्रः प्राविशद्धास्तिनं पुरम् ॥४३॥ तदा कोलाहलो भूयानभूसत्संदिरक्षया । इतस्ततश्च मिलता' पौराखा मुखनिःसृतः ॥४४॥ भगवानादिकर्तास्मान् प्रपालयितुमागतः । पश्यामोऽत्र द्रुतं गत्वा पूजयामश्च भक्तितः ॥४५॥ वनप्रदेशाद् भगवान् प्रत्यावृत्तः सनातनः । अनुगृहीतुमवास्मानिस्यूचुः केचनोचितम् ॥४६॥ केचित् परापर शस्य संदर्शनसमुत्सुक्नः । पौरास्वकान्यकर्तन्याः संदधावुरितोऽमुतः ॥४७॥ भयं स भगवान् दूरामलक्ष्यते प्रांशुविग्रहः । गिरीन्द्र इव निटस जास्यकाञ्चनसच्छविः ॥४८॥ श्रूयते यः श्रुतश्रत्या' जगदेवपितामहः । स नः सनातनो दिया यातः प्रत्यक्षसंनिधिम् ॥४९॥ रटेऽस्मिन् सफले नेत्रे श्रुतेऽस्मिन् सफले श्रुती । स्मृतेऽस्मिन् जन्तुरशोऽपि ब्रजस्यन्त:पवित्रताम् ॥५०॥ सर्वसंगविनिर्मुको 'दीप्रप्रोत्तुकविग्रहः । 'धनरोधविनिर्मुक्तो भाति मास्वानिव प्रभुः ॥५१॥ इदमावर्षमाश्चर्य वदेष जगतां पतिः । विहरत्येवमेकाकी त्यक्तसर्वपरिच्छदः ॥५२॥ अथवा श्रुतमस्मामिः "स्वाधीनसुखकाम्यया । करीव यूथपो'नायो वनं प्रस्थित वानिति ॥५३॥ श्रेयान्स भी स्वयं स्वप्नोंके रहस्यको जाननेवाले हैं ॥४२॥ इस प्रकार पुरोहितके वचनोंसे प्रसन्न हुए वे दोनों भाई स्वप्न अथवा भगवान्की कथा कहते हुए बैठे ही थे कि इतने में ही योगिराज भगवान वृषभदेवने हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥४॥ उस समय भगवान के दर्शनोंकी इच्छासे जहाँ-तहाँसे आकर इकट्ठे हुए नगर निवासी लोगोंके मुखसे निकला हुआ बड़ा भारी कोलाहल हो रहा था |HIोई कर रहा था कि आदिकर्ता भगवान् वृषमदेव हम लोगों का पालन करनेके लिए वहाँ आये हैं; चलो, जल्दी चलकर उनके दर्शन करें और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करें ॥४५॥ कितने ही लोग ऐसे उचित वचन कह रहे थे कि सनातन भगवान् केवल हम लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिए ही वन-प्रदेशसे वापिस लौटे हैं ।।४६॥ इस लोक और परलोकको जाननेवाले भगवानके दर्शन करनेके लिए उत्कण्ठित हुए कितने ही नगरनिवासी जन अन्य सब काम छोडकर इधरसे उधर दौड रहे थे॥४७॥ कोई कह रहा था कि जिनका शरीर सुमेरु पर्वतके समान अतिशय ऊँचा है और जिनकी कान्ति तपाये हुए उत्तम सुवर्णके समान अतिशय देदीप्यमान है ऐसे ये भगवान् दूरसे ही दिखाई देते हैं ॥४८॥ संसारका कोई एक पितामह है ऐसा जो हम लोग केवल कानोंसे सुनते थे वे ही सनातन पितामह भाग्यसे आज हम लोगोंके प्रत्यय हो रहे है-हम उन्हें अपनी आँखोंसे भी देख रहे हैं ।।२इन भगवान्के दर्शन करनेसे नेत्र सफल हो जाते हैं, इनका नाम सुननेसे कान सफल हो जाते हैं और इनका स्मरण करनेसे अज्ञानी जीव भीअन्तःकरणकी पवित्रताको प्राप्त हो जाते हैं।।१०। जिन्होंने समस्त परिग्रहका त्याग कर दिया है और जिनकाअतिशय ऊँचा शरीर बहुत ही देदीप्यमान हो रहा है ऐसे ये भगवान् मेघोंके आवरणसे छूटे हुए सूर्यके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं ।।११।। यह बड़ा भारी आश्चर्य है कि ये भगवान् तीन लोकके स्वामी होकर भी सब परिप्रह छोड़कर इस तरह अकेले ही विहार करते हैं ।२॥ अथवा जो हम लोगोंने पहले सुना था. कि भगवान्ने स्वाधीन सुख प्राप्त करनेकी इच्छासे अण्डकी रक्षा करनेवाले हाथीके समान वनके लिए प्रस्थान किया है सो वह इस समय सत्य मालूम होता है क्योंकि ये परमेश्वर भगवान् १. 'मिल संघाते'। २. पूर्वापरवेदिनः । ३. बेगेन गच्छन्ति स्म । ४. उन्नतशरीरः। ५. उत्तमसुवर्ण । ६. श्रवणपरम्परया । ७. परमेश्वरे । ८. दीप्त-ल., म.। ९. बहुजनोपरोष, पक्षे मेघाच्छादन । १.. परिकरः । ११. स्वायत्तसुखवाञ्छया। १२. यूपनाथः । १३. गतवान् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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