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________________ ४३६ आदिपुराणम् वसन्ततिलकम् भस्यानुसानु सुरपनगखेचराणामा कोडनान्युपवनाति विभान्स्यमूनि । नानालतालयसरःसिकतोच्चयानि नित्यप्रवालकुसुमोज्ज्वलपादपानि ॥१४७॥ मौक्तिकमाला भस्य महाबेपतटम च्छन् मूर्च्छति नानामणिकिरणोधैः । चित्रितमतिर्वियति 'पतङ्गः चित्र पतङ्गच्छविमिह धत्ते ॥१४८॥--- पृथ्वीवृत्तम् मणियुतितान्तरः प्रमुदितोरगन्यन्तरनिरुद्धरविमण्डलैः स्थगितविश्वदिङमण्डलैः । "मरुद्गतिनिवारिभिः सुरवधूमनोहारिभिर्विमाति शिखरधनगिरिरयं नभोलानः ॥१४९॥ चामरवृत्तम् एष मीषणो' महाहिरस्य कन्दरादगिरीषदुन्मिषन्पयोनिधेरिवायत स्तिमिः । "काषपषितान्तिकस्थलस्थगुरुमपादपोरोषशूस्कृतोष्मणा दहत्युपान्तकाननम् ॥१५०॥ छन्दः (?) रस्नालोकैः कृतपर भागे तटमागे सन्ध्यारागे प्रसरति सान्दारुणरागे । रौप्योदीनां प्रकृतिविरुद्धामपि धत्ते प्रेक्ष्या लक्ष्मी कनकमयाद्रेरयमद्विः ॥१५१॥ पूँछ फैलाकर नृत्य कर रहे हैं ॥१४६।। जिनमें देव नागेन्द्र और धरणेन्द्र सदा क्रीडा किया करते हैं, जिनमें नाना प्रकार के लतागृह, तालाब और बालूके टीले (क्रीड़ाचल) बने हुए हैं और जिनके वृक्ष कोमल पत्ते तथा फूलोसे निरन्तर उज्ज्वल रहते हैं ऐसे ये उपवन इस पर्वतके प्रत्येक शिखर पर सुशोभित हो रहे हैं ।।१४७।। इधर, यह सूर्य चलता-चलता इस महापर्वतके किनारे आ गया है और वहाँ अनेक प्रकारके मणियोंके किरणसमूहसे चित्र विचित्र होनेके कारण आकाशमें किसी अनेक रजवाले पक्षीकी शोभा धारण कर रहा है ॥१४८। जिनके मध्यभाग रत्नोंकी कान्तिसे व्याप्त हो रहे हैं, जिनमें नागकुमार और व्यन्तर जातिके देव प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हैं, जिन्होंने सूर्यमण्डलको भी रोक लिया है, जिन्होंने सब दिशाएँ आच्छादित कर ली हैं, जो वायुकी गतिको भी रोकनेवाले हैं, देवांगनाओंके मनको हरण करते हैं और आकाशको उल्लंघन करनेवाले हैं ऐसे बड़े-बड़े सघन शिखरोंसे यह पर्वत कैसा सुशोभित हो रहा है ।।१४९।। इधर देखो, जिस प्रकार कोई महामत्स्य समुद्र में से धीरे-धीरे निकलता है उसी प्रकार इस पर्वतकी गफामें-से यह भयंकर अजगर धीरे-धीरे निकल रहा है। इसने अपने शरीरसे समीपवर्ती लता, छोटे-छोटे पौधे और वृक्षोंको पीस डाला है तथा यह क्रोधपूर्वक की गयी फूत्कार की गरमीसे समीपवर्ती वनको जला रहा है. ॥१५०।। इधर इस पर्वतके किनारेपर अनेक प्रकार के रत्नोंके प्रकाशसे मिली हुई संध्याकालकी गहरी ललाई फैल रही है जिससे यह रूपामय होनेपर भी अपनी प्रकृतिसे विरुद्ध सुवर्णमय मेरु पर्वतकी दर्शनीय शोभा धारण कर रहा है १. आ समन्तात् क्रीडनं एषां तानि । २. पुलिनानि । ३. गच्छन् । ४. व्याप्ते सति । ५. आकाशे । ६. सूर्यः, पक्षी। ७. सूर्यः, चित्रपक्षी (मकर इति यावत्)। ८. विस्तृतान्तरालैः । ९. आच्छादित । १०. मेघ । ११. भयंकरः । १२. उद्गच्छन् । १३. दीर्घमत्स्यः । १४. कषणचूर्णित । काय म०, ल०, द., अ०, प० । १५. रोषफत्कृतोष्मणा ल०, म । रोषमुक्तशत्कृतो प०, अ०। १६. उद्योतः । १७. विहितशोभे । १८. दीप्तां म०, ल० । १९. स्वरूप । २०. दर्शनीयाम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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