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________________ ४३५ एकोनविंशं पर्व अस्य महादेरनुतटमेषा राजति नानाद्रुमवनराजी । 'पश्यतमेनामनिलविधूतैर्नर्तितुकामामिव विटपैः स्वैः ॥११॥ 'उपजातिः कूजद्विरेफा वनराजिरेषा प्रोद्गातुकामेव महीध्रमेनम् । पुष्पान्जलिं विक्षिपतीव विश्वग्विकीर्यमाणैः सुमनःप्रतानः ॥१४२॥ वनद्रुमाः षट्पदचौरवृन्दविलुप्यमानप्रसवार्थसाराः । चोकू यमाना इव भान्स्यमुमिन समुच्चरत्कोकिलकूजितेन ॥१४३॥ भुजङ्गप्रयातम् महादेरमुष्य स्थलीः कालधौतीरुपेत्य स्फुट नृत्यतां बर्हिणानाम् । प्रतिच्छायया तन्यते ग्यवतमस्मिन् समुत्फुल्लनीलाब्जपण्डस्य लक्ष्मीः ॥१४४॥ पुष्पिताना अतुलितमहिमा हिमावदातद्युतिरनतिक्रमणीयपुण्यमूर्तिः । रजतगिरिरयं विलहिताधिः सुरसरिदोघ इवावमाति पृश्याम् ॥१४५॥ मौक्तिकमाला भस्य महानुतटमुच्चैः प्रेक्ष्य विनीलामुपवनराजीम् । नृत्यति हप्टो जलदविशको बहिंगणोऽयं विरचितबहः ॥१४॥ एक प्रकारका विशेष नृत्य कर रहा है ॥१४०॥ इस महापर्वतके किनारे-किनारे नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वनकी पंक्ति सुशोभित हो रही है । देखो, वह वायुके द्वारा हिलते हुए अपने वृक्षोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो नृत्य ही करना चाहती हो ॥१४१।। जिसमें अनेक भ्रमर गुंजार कर रहे हैं ऐसी यह वनोंकी पंक्ति ऐसी मालूम होती है मानो इस पर्वतका यश ही गाना चाहती हो और जो इसके चारों ओर फूलोंके समूह बिखरे हुए हैं उनसे यह ऐसी जान पड़ती है मानो इस पर्वतको पुष्पाञ्जलि ही दे रही हो ॥१४२।। इस वनके वृक्षोंपर बैठे हुए भ्रमर पुष्परसका पान कर रहे है और कोयले मनोहर शब्द कर रही हैं जिससे ऐसा मालूम होता है मानो भ्रमररूपी चोरोंके समूहने इन वन-वृक्षोंका सब पुष्प-रसरूपी धन लूट लिया है और इसीलिए वे बोलती हुई कोयलोंके शब्दोंके द्वारा मानो हल्ला ही मचा रहे हों ॥१४३।। इस पर्वतके चाँदीके बने हुए प्रदेशोंपर आकर जो मयूर खूब नृत्य कर रहे हैं उनके पड़ते हुए प्रतिबिम्ब इस पर्वतपर खिले हुए नीलकमलोंके समूहकी शोभा फैला रहे हैं। भावार्थ-चाँदीकी सफेद जमीनपर पड़े हुए मयूरों के प्रतिबिम्ब ऐसे जान पड़ते हैं मानो पानीमें नील कमलोंका समूह ही फूल रहा हो ॥१४४। इसका माहात्म्य अनुपम है, इसकी कान्ति बर्फके समान अतिशय स्वच्छ है, इसकी पवित्र मूर्तिका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता अथवा यह किसी के भी द्वारा उल्लंघन न करने योग्य पुण्यकी मूर्ति है और इसने स्वयं समुद्र तक पहुँचकर उसे तिरस्कृत कर दिया है इन सभी कारणोंसे यह चाँदीका विजयाध पर्वत पृथिवीपर गंगा नदी के प्रवाह के समान सुशोभित हो रहा है ॥१४५।। इस महापर्वतके प्रत्येक ऊँचे तटपर लगी हुई हरी-हरी वनपंक्तिको देखकर इन मयूरोंको मेघोंकी शंका हो रही है जिससे वे हर्षित हो १. विलोकयतम् । २. भृशं ध्वनन्तः । ३. रजतमयीः । 'कलधौतं रूप्यहेम्नोः' इत्यभिधानात् । ४. प्रतिबिम्बेन । ५. 'त' पुस्तके चतुर्थपादो नास्ति । ६. दृष्टवा ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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