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________________ आदिपुराणम् स्वर्गवासापहासीनि पुराण्यत्र चकासति । दक्षिणोत्तरयोः श्रेण्योः पञ्चाशत् षष्टिरेव च ॥ ३०॥ विद्याधरा वसन्त्येषु नगरेषु महर्द्धिषु । स्वपुण्योपार्जितान् भोगान् भुञ्जानाः स्वर्गिणो यथा ॥ ३१ ॥ इतः किं नामितं नाम्ना पुरं भाति पुरो दिशि । सौधैरभ्रङ्कषैः स्वर्गमिवास्पृष्टुं समुद्यतैः ॥ ३२ ॥ ततः किन्नरगीताख्यं पुरमिद्धद्धिं लक्ष्यते । यस्योद्यानानि सेव्यानि गीतैः किन्नरयोषिताम् ॥३३॥ नरगीतं विभातीतः पुरमेतन्महर्द्धिकम् । सदा प्रमुदिता यत्र नरा नार्यश्च सोरसवाः ॥ ३४ ॥ बहुकेतुकमेतच्च प्रोल्लसद्बहुकेतुकम् | केतुबाहुभिराह्नातुमस्मानिव समुद्यतम् ॥ ३५ ॥ पुण्डरीकमिदं यत्र पुण्डरीकवनेष्वमी । हंसाः कलरुतैर्मन्द्रं स्वनन्ति श्रोतृहारिभिः ॥ ३६ ॥ सिंहध्वजमिदं सैंहैर्ध्वजैः सौधाप्रवर्तिभिः । निरुणद्धि सुरेभाणां मार्ग सिंहविशङ्किनाम् ॥३७॥ श्वेतकेतुपुरं भाति श्वेतैः केतुभिराततैः । सौधाप्रवर्तिभिर्दूराज्झषकेतु मिवाह्वयत् ॥ ३८॥ गरुडध्वजसंज्ञं च 'पुरमाराविराजते । गरुडप्रावनिर्माणैः सौधास्तखाङ्गणम् ॥३९॥ श्रीप्रमं श्रीप्रमोपेतं श्रीधरं च पुरोत्तमम् । भातीदं द्वयमन्योन्यस्पर्धयेव श्रियं श्रितम् ॥४०॥ लोहार्गलमिदं लौहैरर्गलैरतिदुर्गमम् । भरिंजयं च जित्वारीन् हसतीव स्वगोपुरैः ॥ ४१ ॥ 1 ४२२ लम्बाई दक्षिण श्रेणीकी लम्बाईसे कुछ अधिकता रखती है ||२९|| इन्हीं दक्षिण और उत्तर श्रेणियों में क्रम से पचास और साठ नगर सुशोभित हैं । वे नगर अपनी शोभासे स्वर्ग के विमामानोंकी भी हँसी उड़ाते हैं ||३०|| बड़ी विभूतिको धारण करनेवाले इन नगरोंमें विद्याधर लोग निवास करते हैं और देवोंकी तरह अपने पुण्योदयसे प्राप्त हुए भोगोंका उपभोग करते हैं ||३१|| इधर यह पूर्व दिशामें १ किन्नामित नामका नगर है जो कि मानो स्वर्गको छूनेके लिए ही ऊँचे बढ़े हुए गगनचुम्बी राजमहलोंसे सुशोभित हो रहा है ||३२|| वह बड़ी विभूतिको धारण करनेवाला २ किन्नरगीत नामका नगर दिखाई दे रहा है जिसके कि उद्यान किन्नर जाति की देवियोंके गीतोंसे सदा सेवन करने योग्य रहते हैं ||३३|| इधर यह बड़ी विभूतिको धारण करनेवाला ३ नरगीत नामका नगर शोभायमान है, जहाँके कि स्त्री-पुरुष सदा उत्सव करते हुए प्रसन्न रहते हैं ||३४|| इधर यह अनेक पताकाओंसे सुशोभित ४ बहुकेतुक नामका नगर है जो कि ऐसा मालूम होता है मानो पताकारूपी भुजाओंसे हम लोगोंको बुलाने के लिए ही तैयार हुआ हो ||३५|| जहाँ सफेद कमलोंके वनोंमें ये हंस कानोंको अच्छे लगनेवाले मनोहर शब्दों द्वारा सदा गम्भीर रूपसे गाते रहते हैं ऐसा यह ५ पुण्डरीक नामका नगर है || ३६ || इधर यह ६ सिंहध्वज नामका नगर है जो कि महलोंके अग्रभागपर लगी हुई सिंहके चिह्नसे चिह्नित ध्वजाओंके द्वारा सिंहकी शंका करनेवाले देवोंका मार्ग रोक रहा है ||३७|| इधर यह ७ श्वेतकेतु नामका नगर सुशोभित हो रहा है जो कि महलोंके अग्रभागपर फहराती हुई बड़ी-बड़ी सफेद ध्वजाओंसे ऐसा मालूम होता है मानो दूरसे कामदेवको ही बुला रहा हो ||३८|| इधर यह समीपमें ही, गरुड़मणिसे बने हुए महलोंके अग्रभागसे आकाशरूपी आँगनको व्याप्त करता हुआ ८ गरुडध्वज नामका नगर शोभायमान हो रहा है ||३९|| इधर ये लक्ष्मीकी शोभासे सुशोभित ९ श्रीप्रभ और १० श्रीधर नामके उत्तम नगर हैं, ये दोनों नगर ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो इन्होंने परस्परकी स्पर्धासे ही इतनी अधिक शोभा धारण की हो ॥ ४० ॥ जो लोहे के अर्गलोंसे अत्यन्त दुर्गम है ऐसा यह ११ लोहार्गल नामका नगर है और यह १२ अरिंजय नगर है जो कि अपने गोपुरोंके द्वारा ऐसा मालूम होता है मानो १. श्रोत्रहारिभिः अ०, प०, स० । २. सुरेन्द्राणां ल० म०, स० । ३. कामम् । ४. समीपे । ५. गरुडोद्गारमणिनिर्मितः । ६. लक्ष्मीशोभासहितम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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