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________________ पञ्चदश पर्व ३४१ मुखमस्य मुखालोकमखण्डपरिमण्डलम् । शशाकमण्डलस्याधाल्लक्ष्मी मझुणकान्तिकम् ॥१७॥ कर्णाभरणदी प्रांशुपरिवेषेण विद्युते । मुखेन्दुरस्य दन्तोन चन्द्रिकामभितः किरन् ॥ १७९।। रवी दीप्तिर्विधौ कान्तिर्विकासश्च महोत्पलं । इति ब्यस्ता गुणाः प्रापुस्तदास्य सहयोगिताम् ॥१८॥ शशी परिक्षयी पद्मः संकोचं यात्यनुक्षपम् । सदाविकासि पूर्ण च तन्मुखं क्वोपमीयते ॥१८॥ जितं सदा विकासिन्या तन्मुखाब्जस्य शोभया । प्रस्थितं वनवासाय मन्ये वनजमुज्ज्वलम् ॥१८२।। "पट्टबन्धोचितस्यास्य ललाटस्या हतद्यतेः । तिग्मांशोरंशवो ननं विनिर्माणाङ्गतां गताः ॥१८३॥ विलोक्य विलसत्कान्ती तत्कपोलो हिमयुतिः । स्वपराजयनिर्वेदाद् गतः शङ्के कलङ्किताम् ॥१८४॥ भ्रलते ललिते तस्य लीलां दधतुरूर्जिताम् । बैजयन्त्याविवोरिक्ष मदनेन जगजये ॥१८५॥ मुखप्राङ्गणपुष्पोपहारः शारित दिङ्मुखः । नेत्रोत्पलविकासोऽस्य पप्रथे प्रथयन् मुदम् ॥१८६॥ तरलापाङ्गभासास्य सश्रुतावपि लविती । कर्णी लोलास्मनां प्रायो नानुल्लयोऽस्ति कश्चन ॥१८७॥ अथवा उसका मुख पूर्ण चन्द्रमण्डलकी शोभा धारण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार पूर्ण चन्द्रमण्डलके देखनेसे सुख होता है उसी प्रकार उसका मुख देखनेसे भी सबको सुख होता था जिस प्रकार पूर्ण चन्द्रमण्डल अखण्ड गोलाईसे सहित होता है उसी प्रकार उसका मुख भी अखण्ड गोलाईसे सहित था और जिस प्रकार पूर्ण चन्द्रमण्डल अखण्ड कान्तिसे युक्त होता है उसी प्रकार उसका मुख भी अखण्ड कान्तिसे युक्त था ॥१७८।। चारों ओर दाँतोकी किरणोंरूपी चाँदनीको फैलाता हुआ उसका मुखरूपी चन्द्रमा कर्णभूषणकी देदीप्यमान किरणोंके गोल परिमण्डलसे बहुत ही शोभायमान होता था॥१७९॥ सूर्यमें दीप्ति, चन्द्रमामें कान्ति और कमलमें विकास इस प्रकार ये सब गुण अलग-अलग रहते हैं परन्तु भरतके मुखपर वे सब गुण सहयोगिताको प्राप्त हुए थे अर्थात् साथ-साथ विद्यमान रहते थे ॥१८॥ चन्द्रमा क्षयसे सहित है और कमल प्रत्येक रात्रिमें संकोचको प्राप्त होता रहता है परन्तु उसका मुख सदा विकसित रहता था और कभी संकोचको प्राप्त नहीं होता थापूर्ण रहता था इसलिए उसकी उपमा किसके साथ दी जाये ? उसका मुख सर्वथा अनुपम था ॥१८१।। ऐसा मालूम होता है कि उसका मुखकमल सदा विकसित रहनेवाली लक्ष्मीसे मानो हार ही गया था अतएव वह वन अथवा जलमें निवास करनेके लिए प्रस्थान कर रहा था ॥१८२॥ पट्टबन्धके उचित और अतिशय कान्तियुक्त उसके ललाट के बनने में अवश्य ही सूरजकी किरणें सहायक सिद्ध हुई थीं ॥१८३।। शोभायमान कान्तिसे युक्त उसके दोनों कपोल देखकर चन्द्रमा अवश्य ही पराजित हो गया था और इसलिए ही मानो विरक्त होकर वह सकलंक अवस्थाको प्राप्त हुआ था ।।१८४।। उसकी दोनों भौंहरूपी सुन्दर लताएँ ऐसी अच्छी शोभा धारण कर रही थीं मानो जगत्को जीतनेके समय कामदेवके द्वारा फहरायी हुई दो पताकाएँ ही हों॥१८५।। उसके नेत्ररूपी नील कमलोंका विकास मुखरूपी आँगनमें पड़े हुए फूलोंके उपहारके समान शोभायमान हो रहा था तथा समस्त दिशाओंको चित्र-विचित्र कर रहा था और इसीलिए वह आनन्दको विस्तृत कर अतिशय प्रसिद्ध हो रहा था ॥१८६।। उसके चञ्चल कटाक्षोंकी आभाने श्रवणक्रियासे युक्त (पक्षमें उत्तम-उत्तम शास्त्रोंके ज्ञानसे युक्त) उसके दोनों कानोंका उल्लंघन कर दिया था सो ठीक ही है चञ्चल अथवा सतृष्ण हृदयवाले १. -मक्षुण्ण- म०, ल० । २. -दीप्तांशु- अ०, म०, द०, स० । ३. दन्तांशु-द०, म । उस्रः किरणः। ४. पथगभूताः । ५. सहवासिताम् । ६. रात्रि प्रति । ७. नित्यविकासि । ८. जलवासाय । ९. -मुद्विजत् स०, -मुद्रीजम् प०, अ०, म०, ल०। १०. 'पट्टबन्धाञ्चितस्यास्य' म० पुस्तके पाठान्तरम् । ११. हटद्युतेः द०, म०, स० । १२. उपादानकारणताम् । १३. सारितदिङमुखः ल० । पूरितदिङ्मुखः अ०, स०, द. । शारित कवुरित ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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