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________________ ३४० आदिपुराणम तदेव' पैतृकं यातं समाक्रान्त त्रिविष्टपम् । तदेवास्य वपुद्दीप्तं तदेव हसितं स्मितम् ॥ १६६ ॥ सैव वाणी कला से सा विद्या सैव च द्युतिः । तदेव शीलं विज्ञानं सर्वमस्य तदेव तत् ॥१६७॥ इति तन्मयतां प्राप्तं पुत्रं दृष्ट्वा तदा प्रजाः । आत्मा वै पुत्रनामासीदध्यगीषत सूनृतम् ॥१६८॥ पित्रा व्याख्यातरूपादिगुणः प्रत्यक्षमन्मथः । स सम्मतः सतामासीत् स्वैर्गुणैरामि गामिकैः ॥ ३६९ ॥ मनोर्मनोऽर्पयन् प्रीतो मनुरेवोद्गतः सुतः । मनो मनोभवाकारः प्रजानामध्युवास सः ॥ १७० ॥ जयलक्ष्म्यानपायिन्या वपुस्तस्यातिभास्वरम् । पुञ्जीकृतमिबैकत्र क्षात्रं तेजो विदिद्युते ॥ १७१ ॥ दिव्यमानुषतामस्य व्यापयद्व पुरूर्जितम् । तेजोमयैरिवारब्धमणुभिर्व्यचुतत्तराम् ॥ १७२॥ तस्योत्तमाङ्गमुत्तुङ्गमौलिरत्नांशुपेशलम् । सचूलिकमिवाद्रीन्द्रशिखरं भृशमद्युतत् ॥ १७३॥ क्रमोन्नतं सुवृत्तं च शिरोऽस्य रुरुचेतराम् । धात्रा निवेशितं दिव्यमातपत्रमिव श्रियः || १७४ ।। शिरोऽस्याकुचित स्निग्धविनीलैक जमूर्द्धजम् । विनीलरत्नविन्यस्त शिरस्त्राणमित्रारुचत् ॥ १७५ ॥ ऋज्वीं मनोवचःकायवृत्तिमुद्वहतः प्रभोः । केशान्तानलिसङ्काशान् भेजे कुटिलता परतू ॥ १७६ ॥ स्मैरं वक्त्राम्बुजं तस्य दशनाभीपुकेसरम् । श्रमौ सुरभिनिःश्वासपत्र नाहूतषट्पदम् ॥ १७७॥ की ।। १६५ ।। इस भरतका अपने पिता भगवान् वृपभदेव के समान ही गमन था, उन्हींके समान तीनों लोकोंका उल्लंघन करनेवाला देदीप्यमान शरीर था और उन्हींके समान मन्द हास्य था ।। १६६ ।। इस भरतकी वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान आदि सब कुछ बहीं थे जो कि उसके पिता भगवान् वृषभदेव के थे || १६७ || इस प्रकार पिताके साथ तन्मयताको प्राप्त हुए भरत पुत्रको देखकर उस समय प्रजा कहा करती थी कि पिताका आत्मा ही पुत्र नामसे कहा जाता है [ आत्मा वै पुत्रनामासीद् ] यह बात बिलकुल सच ॥ १६८ ॥ स्वयं पिताके द्वारा जिसके रूपादि गुणोंकी प्रशंसा की गयी हैं, जो साक्षात् कामदेवके समान है ऐसा वह भरत अपने मनोहर गुणोंके द्वारा सज्जन पुरुषोंको बहुत ही मान्य हुआ था || १६९ || वह भरत पन्द्रहवें मनु भगवान् वृषभनाथ के मनको भी अपने प्रेमके अधीन कर लेता था इसलिए लोग कहा करते थे कि यह सोलहवाँ मनु ही उत्पन्न हुआ है। और वह कामदेव के समान सुन्दर आकारवाला था इसलिए समस्त प्रजाके मनमें निवास किया करता था ।। १७० ।। उसका शरीर कभी नष्ट नहीं होनेवाली विजयलक्ष्मीसे सदा देदीप्यमान रहता था इसलिए ऐसा सुशोभित होता था मानो किसी एक जगह इकट्ठा किया हुआ अत्रियोंका तेज ही हो ।। १७१ ।। 'यह कोई अलौकिक पुरुष है' [ 'मनुष्य रूपधारी देव है' ] इस बातको प्रकट करता हुआ भरतका बलिष्ठ शरीर ऐसा शोभायमान होता था मानो वह तेजरूप परमाणुओंसे ही बना हुआ हो ।। १७२ ।। अत्यन्त ऊँचे मुकुट में लगे हुए रत्रोंकी किरणों से शोभायमान उसका मस्तक चूलिका सहित मेरुपर्वत के शिखर के समान अतिशय शोभायमान होता था || १७३ ॥ क्रम-क्रमसे ऊँचा होता हुआ उसका गोल शिर ऐसा अच्छा शोभायमान होता था मानो विधाताने [ वक्षःस्थलपर रहनेवाली ] लक्ष्मीके लिए अत्र ही बनाया हो || १७४|| कुछ-कुछ टेढ़े, स्निग्ध, काले और एक साथ उत्पन्न हुए केशोंसे शोभायमान उसका मस्तक ऐसा जान पड़ता था मानो उसपर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई टोपी ही रखी हो || १७५|| भरत अपने मन, वचन, कायकी प्रवृत्तिको बहुत ही सरल रखता था इसलिए जान पड़ता था कि उनकी कुटिलता उसके भ्रमरके समान काले केशोंके अन्त भागमें ही जाकर रहनेलगी ।।१७६।। दाँतोंकी किरणोंरूपी केशर से सहित और सुगन्धित श्वासोच्छ्वासके पवन द्वारा भ्रमरोंका आह्वान करनेवाला उसका प्रफुल्लित मुखकमल बहुत ही शोभायमान होता था ॥ १७७॥ १. पितृप । २. गमनम् । ३. पितृस्वरूपताम् । ४. पित्रा सह । ५. राभिरामकैः अ०, प०, व०, ६० । ६. पुरोः । ७. ईपद्वक्रः । ८. युगपज्जातम् । ह्रस्वोन्नतरहिता इत्यर्थः । ९ रचितम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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