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________________ .पश्चदशं पर्व ३३९ कृतरङ्गवलौ-रस्नचूर्णभूमौ महोदराः । कुम्मा हिरण्मया रेजुः रौक्माब्जपिहिताननाः ॥१५४॥ तस्मिन् नृपोत्सवे सासीत् पुरी सर्वैव सोत्सवा । यथाब्धिवृद्धौ संवृद्धिं याति वेलाश्रिता नदी ॥१५५॥ न दीनोऽभूत्तदा कश्चित् 'नदीनोदकभूयसोम् । दानधारां नृपेन्द्रेभे मुक्तधारं प्रवर्षति ।।१५६॥ इति प्रमोदमुत्पाद्य पुरे सान्तःपुरे परम् । वृषमाटेरसौ बालः प्रालेययुतिरुद्ययौ ॥१५॥ "प्रमोदभरतः प्रेमनिर्भरा बन्धुता तदा । तमाद् भरतं मावि समस्तभरताधिपम् ॥१५॥ तनाम्ना भारतं वर्षमिति हासीजनास्पदम् । हिमाद्रेरासमुद्राच क्षेत्रं चक्रभृतामिदम् ॥१५९॥ स तन्वन्परमानन्दं बन्धुताकुमुदाकरे । धुन्वन् वैरिकुलध्वान्तमवृधद् बालचन्द्रमाः ॥१६०॥ स्तनन्धयमसौ मातुः स्तन्यं गण्डूषितं मुहुः । समुगिरन् यशो दिक्षु विभजविव विद्यते ॥१६॥ स्मितैश्च हसितैर्मुग्धैः सर्पणैर्मणिममिषु । "मन्मनालपितैः पित्रोः स संप्रीतिमजीजनत् ॥१.६२॥ तस्य वृद्धावमद् वृद्धिगुणानां सहजन्मनाम् ।' नूनं ते तस्य सोदर्यास्तवृद्ध्यनुविधायिनः ॥१६३॥ अन्नप्राशनचौलोपनयनादीननुक्रमात् । क्रियाविधीन विधानज्ञः स्रष्टवास्य निसृष्टवान् ॥१६॥ ततः क्रमभुवो बाल्यकौमारान्तर्भुवो मिदाः । सोऽतीत्य यौवनावस्था प्रापदानन्दिनी शाम् ॥ १६५॥ सुन्दर रचनाएँ घर-घर शोभायमान हो रही थीं ॥१५३।। जहाँ रनोंके चूर्णसे अनेक प्रकारके वेलबूटोंकी रचना की गयी है ऐसी भूमिपर बड़े-बड़े उदरवाले अनेक सुवर्णकलश रखे हुए थे। उन कलशोंके मुख सुवर्णकमलोंसे ढके हुए थे इसलिए वे बहुत ही शोभायमान हो रहे थे ॥१५४।। जिस प्रकार समुद्रकी वृद्धि होनेसे उसके किनारेकी नदी भी वृद्धिको प्राप्त हो जाती है उसी प्रकार राजाके घर उत्सव होनेसे वह समस्त अयोध्यानगरी उत्सवसे सहित हो रही थी ॥१५५।। उस समय भगवान् वृषभदेवरूपी हाथी समुद्र के जलके समान भारी दानकी धारा (सुवर्ण आदि वस्तुओंके दानकी परम्परा, पक्षमें- मदजलकी धारा) बरसा रहे थे इसलिए वहाँ कोई भी दरिद्र नहीं रहा था ॥१५६।। इस प्रकार अन्तःपुरसहित समस्त नगरमें परम आनन्दको उत्पन्न करता हुआ वह बालकरूपी चान्द्रमा भगवान् वृषभदेवरूपी उदयाचलसे उदय हुआ था॥१५७। उस समय प्रेमसे भरे हुए बन्धुओंके समूहने बड़े भारी हर्षसे, समस्त भरतक्षेत्रके अधिपति होनेवाले उस पुत्रको 'भरत' इस नामसे पुकारा था॥१५८।। इतिहासके जाननेवालोंका कहना है कि जहाँ अनेक आर्य पुरुष रहते हैं ऐसा यह हिमवत् पर्वतसे लेकर समुद्र पर्यन्तका चक्रवर्तियोंका क्षेत्र उसी 'भरत' पुत्रके नामके कारण भारतवर्ष रूपसे प्रसिद्ध हुआ है ।।१५९।। वह बालकरूपी चन्द्रमा भाई-बन्धुरूपी कुमुदोंके समूहमें आनन्दको बढ़ाता हुआ और शत्रुओंके कुलरूपी अन्धकारको नष्ट करता हुआ बढ़ रहा था ॥१६०।। माता यशस्वतीके स्तनका पान करता हुआ वह भरत जब कभी दूधके कुरलेको बार-बार उगलता था तब वह ऐसा देदीप्यमान होता था मानो अपना यश ही दिशाओंमें बाँट रहा हो ॥१६१।। वह बालक मन्द मुसकान, मनोहर हास, मणिमयी भूमिपर चलना और अव्यक्त मधुर भाषण आदि लीलाओंसे माता-पिताके परम हर्षको उत्पन्न करता था ।।१६२।। जैसे-जैसे वह बालक बढ़ता जाता था वैसे-वैसे ही उसके साथ-साथ उत्पन्न हुए-स्वाभाविक गुण भी बदते जाते थे, ऐसा मालूम होता था मानो वे गुण उसकी सुन्दरतापर मोहित होनेके कारण ही उसके साथ-साथ बढ़ रहे थे ।। १६३ ॥ विधिको जाननेवाले भगवान् वृषभदेवने अनुक्रमसे अपने उस पुत्रके अन्नप्राशन (पहली बार अन्न खिलाना), चौल (मुण्डन ) और उपनयन (यज्ञोपवीत ) आदिसंस्कार स्वयं किये थे ।। १६४ ।। तदनन्तर उस भरतने क्रम-क्रमसे होनेवाली बालक और कुमार अवस्थाके बीचके अनेक भेद व्यतीत कर नेत्रोंको आनन्द देनेवाली युवावस्था प्राप्त १. कृतरङ्गावलो अ०, ५०, स०, द०, म०, ल०। २. हेमकमल । ३. दरिद्रः । ४. समुद्रोदकम् । ५. प्रमोदातिशयात् । ६. बन्धुसमूहः। ७. इह काले । ८. पिबन् । ९. क्षीरम् । १०. अव्यक्तवचनैः । ११. इव । १२. सहोदराः । सौन्दर्यात म०, ल०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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