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________________ ३३८ आदिपुराणम् आश्लिष्य पृथिवीं दोभ्यां यदसावुदपद्यत । ततोऽस्य सार्वभौमत्वं जगुर्ने मित्तिकास्तदा ॥१४२॥ सुतेन्दुनातिसौम्येन न्यद्युतच्छर्वरीब सा । बालार्केण पितुश्चासीन दिवसस्येव दीप्तता ।।१४३।। पितामहौ च तस्यामू प्रमोदं परमीयतुः । यया सबेलो जलधिरुदये शशिनशिशोः ॥१४॥ तां तदा वर्धयामासुः पुण्याशीभिः पुरन्ध्रिकाः । सुखं प्रसूव पुत्राणां शतमित्यधिकोत्सवः ॥१४५॥ तदानन्दमहाभेर्यः प्रहताः कोणकोटिमिः । दध्वनुव॑नदम्मोदगभीरं नृपमन्दिरे ॥१४६॥ तुटीपटहझल्लयंः पणवास्तुणवास्तदा । सशङ्खकाहलास्तालाः प्रमदादिव सस्वनुः ।।१४७॥ तदा सुरमिरम्लानिरपतत् कुसुमोत्करः । दिवो देवकरोन्मुक्तो भ्रमभ्रमरसेवितः ।।१४८॥ मृदुर्मन्दममन्देन मन्दाररजसा तत: । ववाववावा' रजसामप्छटाशिशिरो मरुत् ॥१४९॥ जयेत्यमानुषी वाच जजम्भे पथि वार्मुचाम् । जीवेति दिक्षु विख्यानां वाचः पप्रथिरे भृशम् ।।१५०॥ वर्द्धमानलयैर्नृत्तमारप्सत जिताप्सरः । नर्तक्यः सुरनर्सक्यो यकामिहेंलया जिताः ॥१५१॥ पुरवीथ्यस्तदा रेजुश्चन्दनाम्भश्छटोक्षिताः । कृताभिरुपशोमामिः प्रहसन्स्यो दिवः श्रियम् ॥१५२।। रत्नतोरणविन्यासाः पुरे रेजुर्गृहे गृहे । इन्द्रचापतडिद्वल्ली ललितं दधतोऽम्बरे ॥१५॥ महादेवीने सम्राट के शुभ लक्षणोंसे शोभायमान ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न किया था ॥१४१।। वह पुत्र अपनी दोनों भुजाओंसे पृथिवीका आलिंगन कर उत्पन्न हुआ था इसलिए निमित्तज्ञानियोंने कहा था कि वह समस्त पृथिवीका अधिपति-अर्थात् चक्रवर्ती होगा ॥१४२॥ वह पुत्र चन्द्रमाके समान सौम्य था इसलिए माता-यशस्वती उस पुत्ररूपी चन्द्रमासे रात्रिके समान सुशोभित हुई थी, इसके सिवाय वह पुत्र प्रातःकालके सूर्यके समान तेजस्वी था इसलिए पिता-भगवान् वृषभदेवं उस बालकरूपी सूर्यसे दिनके समान देदीप्यमान हुए थे ॥१४३॥ जिस प्रकार चन्द्रमाका उदय होनेपर अपनी बेलासहित समुद्र हर्षको प्राप्त होता है उसी प्रकार पुत्रका जन्म होनेपर उसके दादा और दादी अर्थात् महारानी मरुदेवी और महाराज नाभिराज दोनों ही परम हर्षको प्राप्त हुए थे॥१४४।। उस समय अधिक हर्षित हुई पतिपुत्रवती स्त्रियाँ 'तू इसी प्रकार सैकड़ों पुत्र उत्पन्न कर' इस प्रकारके पवित्र आशीर्वादोंसे उस यशस्वती देवीको बढ़ा रही थीं ॥१४५।। उस समय राजमन्दिर में करोड़ों दण्डोंसे ताड़ित हुए आनन्दके बड़े-बड़े नगाड़े गरजते हुए मेघोंके समान गम्भीर शब्द कर रहे थे ॥१४६॥ तुरही, दुन्दुभि, झल्लरी, शहनाई, सितार, शंख, काहल और ताल आदि अनेक बाजे उस समय मानो हर्षसे ही शब्द कर रहे थे-बज रहे थे ॥१४७। उस समय सुगन्धित, विकसित, भ्रमण करते हुए भौंरोंसे सेवित और देवोंके हाथसे छोड़ा हुआ फूलोंका समूह आकाशसे पड़ रहा था-बरस रहा था ॥१४८।। कल्पवृक्षके पुष्पोंके भारी परागसे भरा हुआ, धूलिको दूर करनेवाला और जलके छींटोंसे शीतल हुआ सुकोमल वायु मन्द-मन्द बह रहा था ॥१४९।। उस समय आकाशमें जय-जय इस प्रकारकी देवोंकी वाणी बढ़ रही थी और देवियोंके 'चिरंजीव रहो' इस प्रकारके शब्द समस्त दिशाओं में अतिशय रूपसे विस्तारको प्राप्त हो रहे थे ॥१५०।। जिन्होंने अपने सौन्दर्यसे अप्सराओंको जीत लिया है और जिन्होंने अपनी नृत्यकलासे देवोंकी नर्तकियोंको अनायास ही पराजित कर दिया है ऐसी नृत्य करनेवाली खियाँ बढ़ते हुए तालके साथ नृत्य तथा संगीत प्रारम्भ कर रही थीं ॥१५१॥ उस समय चन्दनके जलसे सींची गयी नगरकी गलियाँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो अपनी सजावटके द्वारा स्वर्गकी शोभाकी हँसी ही कर रही हों ॥१५२।। उस समय आकाशमें इन्द्रधनुष और बिजलीरूपी लताकी सुन्दरताको धारण करते हुए रत्ननिर्मित तोरणोंको १. 'यवो + अवावा' इति छेदः । रजसामपनेता । २. देवानाम् । ३. क्रियाविशेषणम् । ४. याभिः नर्तकीभिः । ५. शोभाम।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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